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जून,  2008

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आधी दुनिया की त्रासदी

रीतू तोमर

सवाल यह भी है कि महिलाओं को संसद में आरक्षण दे देने पर क्या सही मायने में उनका भला हो पाएगा? अभी हालत यह है कि लोकसभा की 542 सीटों में से मात्र 45 सीटें महिलाओं को मिली हैं। राज्यसभा के 242 सदस्यों में महज 28 स्त्रियां हैं।

किसी ने ठीक ही कहा है कि समय के साथ-साथ परिस्थितियां बदल जाती हैं। सोच बदल जाती है या यों कहें कि समय इतना बलशाली है कि वह सब कुछ बदल देता है। पर कुछ चीजें ऐसी हैं जो बदल ही नहीं पा रही हैं। महिलाओं की हालत को भी इन्हीं में शुमार किया जा सकता है। आज भी सामाजिक ताना-बाना ऐसा है कि उसमें स्त्री को असहाय और अबला ही समझा जाता है। भारत में एक स्त्री के राष्ट्रपति बन जाने और एक महिला द्वारा केंद्र की सरकार नियंत्रित किए जाने के बावजूद भी नारी को अबला ही माना जा रहा है। यह एक विडंबना ही है कि आजादी के साठ साल बाद भी औरतों को पुरुषों के इशारे पर ही थिरकना पड़ रहा है। महिलाओं की हालत सुधारने के लिए जब-तब उन्हें आरक्ष देने का सियासी राग अलाप दिया जाता है। पर हर बार नतीजा ढाक के तीन पात।

हालांकि, महिला सशक्तिकरण के लिए आरक्षण का इस्तेमाल किया जाना भी कोई सुखद स्थिति का अहसास नहीं कराता है। हां, इसे कुछ समय तक एक अस्थाई व्यवस्था के तौर पर लागू किया जा सकता है। पर असल सवाल नियत का है। सरकार के साथ-साथ अगर लोगों की नियत सही हो जाए तो अबला मानी जाने वाली महिलाएं खुद ब खुद सबल हो जाएंगी। इस मसले पर समाज सेवक विमल आनंद कहते हैं, 'ऐसी नौबत ही क्यों आती है कि महिलाओं को आरक्षण का सहारा लेना पड़ता है। उन्हें समानता के समान अवसर क्यों नहीं दिए जाते।' वहीं डा. नवीन चावला का मानना है कि महिलाओं को शरीरिक ही नहीं मानसिक रूप से भी कमजोर समझा जाता है इसलिए समाज में उन्हें दोयम दर्जा दिया गया है। परंतु ऐसा नहीं है। लंदन में हुए एक अध्ययन के मुताबिक पुरुषों की तुलना में स्त्रियां ज्यादा सुदृढ़ और जागरूक होती हैं। एक दूसरा शोध बताता है कि 65 प्रतिशत शिक्षित लोगों में 35 प्रतिशत तो महिलाएं ही होती हैं। जो जागरूकता के साथ-साथ दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होती हैं। दरअसल, पुरूषों और महिलाओं में व्याप्त असमानता के मूल में अवसर की असमानता भी है। मर्दों को जितनी आसानी से हर क्षेत्र में अपना फन दिखाने का मौका मिल जाता है उतनी आसानी क्षमतावान औरत को नहीं होती। बेशक दुनिया ने आधुनिकता का जामा पहन लिया है लेकिन अभी भी समाज पुरूष प्रधान ही बना हुआ है।

भारत सरकार हमेशा से यह नारा बुलंद करती रही है कि महिलाओं को समान दर्जा मुहैया कराने के लिए वह प्रयासरत है। यह दावा कमोबेश हर दल की सरकार करती रही है। पर इन दावों की पोल उस वक्त खुल गई जब लौंगिक भेदभाव पर 165 देशों का अध्ययन किया गया। इसमें भारत को 115 वां स्थान प्राप्त हुआ। तो सवाल उठता है कि इस लोकतांत्रिक समाज में समानता कहां है?

दुनिया भर में  दिन-प्रतिदिन स्त्रियों पर अत्याचार हो रहे हैं। उन्हें घर की देहरी से बाहर न जाने देने के लिए की जा रही कोशिशें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। वहीं दूसरी तरफ वोट बैंक के सौदागर 'आरक्ष' के मरहम से उस दुखती रग को जब-तब सहला भर देते हैं। सहलाना इसलिए कि अभी तक महिलाओं को आरक्षण दिया नहीं जा सका है। बीते दिनों  संसद में महिला आरक्षण बिल पेश तो हुआ लेकिन इस बार भी बात बहुत आगे नहीं बढ़ पाई। वैसे अहम सवाल यह भी है कि महिलाओं को संसद में आरक्षण दे देने पर क्या सही मायने में नारियों का भला हो पाएगा? अभी हालत यह है कि लोकसभा की 542 सीटों में से मात्र 45 सीटें महिलाओं को मिली हैं। राज्यसभा के 242 सदस्यों में महज 28 स्त्रियां हैं। अब यह बात काबिलगौर है कि जहां से देश का कानून बनता है और इस व्यवस्था का संचालन किया जाता है और वहीं इतनी गैरबराबरी हो तो अन्य स्थानों का क्या हाल होगा? वैसे कई राज्यों में महिलाओं के हाथ में आरक्षण का झुनझुना थमाया गया है। पर अधिकांश मामलों में महिलाओं को सिर्फ मोहरा ही बना दिया गया। ऐसी ही एक घटना मध्य प्रदेश के खंडवा जिले की है। वहां के एक छोटे से गांव में पहली बार कोई महिला सरपंच बनी। वहां की राधाबाई को यह सौभाग्य मिला। पर यह बहुत जल्दी ही दुर्भाग्य में बदल गया। पुरूष प्रधान समाज को एक महिला का सरपंच के रूप में चुना जाना हजम नहीं हुआ। राधाबाई को झूठे आरोपों में फंसाकर पद से हटवा दिया गया। आंकड़े स्पष्ट बताते हैं कि सिर्फ मध्यप्रदेश में ही पंचायत चुनावों में विजयी सैकड़ों महिलाओं पर झूठे भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर या डरा-धमकाकर दबंगता से उन्हें रास्ते से हटा दिया गया।

इसी तरह बिहार में भी पंचायत चुनाव में महिलाओं को आरक्षण दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि बड़ी संख्या में औरतों ने चुनाव में परचम लहरा दिया। पर उनकी भूमिका बस हस्ताक्षर करने और मुहर लगाने  की ही रही। उनके स्थान पर सारे कार्य उनके पति करने लगे। पति के हर सही-गलत निर्णय मानने को महिला प्रतिनिधियों को बाध्य होना पड़ा। कई ऐसे मामले उजागर हुए जिनमें भ्रष्टाचार का आरोप इन जन प्रतिनिधियों पर लगाया गया। साफ है कि गड़बड़ी में तो महिलाओं की भागीदारी बस अंगूठा लगाने की थी लेकिन कानून की नजर में दोषी उन्हें ठहराया गया। यह वाजिब भी है क्योंकि अज्ञानता किसी के अपराध को कम नहीं कर  देती।

उल्लेखनीय है कि भारत में पहली बार विधानमंडलों में आरक्षण अंग्रेजों के राज में 1909 में लागू किया गया था। उस समय मुसलमानों को यह सुविधा दी गई थी। जब विदेशी सरकार को यह लगा कि वह 'फूट डालो और शासन करो' की नीति में कामयाब हो रही है तो 1932 में कम्युनल अवार्ड के द्वारा इसका विस्तार कर दिया गया। इसके खिलाफ उस वक्त महात्मा गांधी को उपवास करना पड़ा था। इसके बाद फिर ऊंची जाति के हिन्दुओं और भीमराव आंबेडकर के बीच  एक समझौता हुआ। इसमें यह तय किया गया कि दलितों और आदिवासियों के लिए विधानमंडलों में दुगुनी सीटें तो आरक्षित कर दी जाएंगी लेकिन अलग से मतदाता सूची नहीं बनेगी। संविधान बनाते वक्त यह तय हुआ कि दलितों और आदिवासियों के अलावा किसी को आरक्षण नहीं दिया जाए। इनके लिए भी यह व्यवस्था महज दस साल के लिए की गई थी। ऐसा सभी वर्गों के नेताओं ने आपसी सहमति के जरिए तय किया था। सबका मानना था कि आरक्षण देश की एकता पर नकारात्मक असर डालेगी। हालांकि, जब आंबेडकर और आदिवासियों के नेता दस साल की इस अवधि को बढ़ाने की मांग कर रहे थे तो उस समय के नेताओं ने ऐसा प्रावधान कर दिया कि इसे दस-दस साल की अवधि के लिए बढ़ाया जा सकता है। इसी को आधार बनाकर आरक्षण का विस्तार होता रहा और जिनकी भलाई के लिए इसका सहारा लिया गया वे अभी भी बेसहारा हैं। उनकी हालत अभी भी दयनीय ही है। हां यह बात अलग है कि उनके नाम पर सियासत करने वाले सत्ता सुख भोगने में रत हैं। अब ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मात्र आरक्षण देने से महिलाओं की हालत सुधर पाएगी? इतना तो तय है कि आरक्षण के नाम पर राजनीति रोटियां सेकने का ही काम हो रहा है। यह सियासत ही है जो किरण बेदी जैसी योग्य महिला आईपीएस अधिकारी को दिल्ली की कमिश्नर नहीं बनने देती है और वह व्यवस्था से अलग होने का फैसला लेने को बाध्य हो जाती है।

दरअसल, अगर समाज सही मायने में आधी दुनिया का भला चाहती है तो मानसिकता को बदलना होगा। इसके अलावा महिलाओं को जागरूक बनाए जाने की दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाने की दरकार है। तब ही समाज में चेतना जग पाएगी और 'स्त्री-पुरूष समानता' का झंडा भारत में लहरा पाएगा। जाहिर है कि अगर ऐसा हो पाता है तो देश के समग्र विकास में गति आना भी तय है। क्योंकि आधी आबादी की उपेक्षा करके कोई भी समाज अपनी लय को बनाए नहीं रख सकता है।

ईमेल: ritu.chill01@yahoo.co.in

 

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