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जून,  2008

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अमेरिका की फूड पालिटिक्स

उमाशंकर मिश्र

संयुक्त राष्ट्र की संस्था खाद्य और कृषि संगठन 'एफएओ' की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व भर में लगभग 37 देश आज खाद्यान्न की कमी का सामना कर रहे हैं। कैमरून, मिस्र तथा इंडोनेशिया जैसे देशों में तो अनाज को लेकर दंगे तक भड़क चुके हैं।

हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश का यह बयान सुर्खियों में रहा कि विश्व में खाद्यान्न संकट के लिए भारत और चीन जिम्मेदार है। शुरुआत करते हैं क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रे के उस कथन से जिसे उन्होंने करीब एक वर्ष पूर्व खाद्यान्न संकट के संदर्भ में ही कहा था। कास्त्रे ने इस तरह की परिस्थितियों को काफी पहले ही भांप लिया था और इसी के चलते उन्होंने एक तरह से भविष्यवाणी की थी, 'अमेरिका अनाज की कीमतों में कृत्रिम तेजी ला रहा है और इससे वैश्विक स्तर पर अकाल भी पड़ सकता है।' आज जब विश्व में खाद्यान्न संकट उभरकर सामने आ रहा है तो कास्त्रे की बात सच होती दिखाई दे रही है। सबसे पहले तो यहां स्टॉकहोम के अंतर्राष्ट्रीय जल संस्थान, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन और अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान की उस रिपोर्ट का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है, जिसमें अमेरिका में 48.3 अरब डालर मूल्य का 30 फीसदी कूड़े में फेक दिए जाने की बात कही गई है। इसके अलावा अमेरिका एक ऐसा देश है जहां प्रसंस्करण और पैकेजिंग मेंं ही खाद्य उत्पादों की काफी बर्बादी होती है।

अमेरिका में बायोफ्यूल ई-85 के विस्तार पर तेजी से काम चल रहा है। तेल अमेरिका की कमजोरी रहा है। सामंतवादी मानसिकता वाले इस देश ने भले ही सभी भौतिक ऐशो-आराम जुटा लिए हों लेकिन पेट्रोलियम ईंधन ही है, जिस पर कब्जा जमाने के लिए अमेरिका ने खाड़ी देशों पर बमबारी तक कर डाली। खनिज तेल की निर्भरता को कम करने के लिए अब अमेरिका में बायोफ्यूल को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस समय 50 लाख गाडियां वहां एथनाल से चल रही हैं। अमेरिका में प्रसारित किए जा रहे ई-85 आयल में 85 प्रतिशत एथनाल होता है, जबकि गैसोलीन की मात्र 15 प्रतिशत होती है। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस एथनाल के प्रसार पर अमेरिकी प्रशासन जुटा हुआ है उसके उत्पादन में ही 26 प्रतिशत ऊर्जा की खपत हो जाती है। इस बात को खुद अमेरिकी प्रशासन भी मानता है। इसके बावजूद 2025 तक एथनाल के सहारे अमेरिका अपनी तेल निर्भरता को 75 प्रतिशत तक कम करने पर तुला हुआ है, ताकि पेट्रोल तथा डीजल की उपलब्धता के चलते दुनिया के कमजोर देशों पर उसकी दादागीरी कायम रह सके। इसके लिए खाद्यान्नों को ही चाहे गाड़ियों के पेट्रोल टैंक में झोंकना पड़े, भले ही करोड़ों लोगों को भूखे मरना पड़ रहा हो। ई-85 आयल की इस जरूरत को पूरा करने के लिए 119 बिलियन गैलन बायोफ्यूल की जरूरत होगी। इतनी मात्र में बायोफ्यूल के उत्पादन के लिए अमेरिका अपने देश की कृषिभूमि का उपयोग करने की बजाए अन्य देशों पर नजर गड़ाए बैठा हुआ है। दुनिया के विभिन्न देशों में जट्रोफा के प्रमोशन को इससे अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। ब्राजील तथा भारत जैसे देशों को इसके लिए निशाना बनाया जा रहा है। इसके लिए दो कारणों को मुख्य तौर पर लिया जा सकता है। एक तो यह कि भारत जैसे देश जो निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर अमेरिका के आंखों की किरकिरी बनते जा रहे हैं। क्योंकि अमेरिका यह समझने लगा है यदि इन देशों इसी तरह बढ़ने दिया गया तो उसका प्रभुत्व दुनिया से उठ जाएगा। दूसरा और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि भारत तथा ब्राजील जैसे देशों में बायोफ्यूल  को बढ़ावा दिया जाएगा तो ये खाद्यान्न समस्या से घिर जाएंगे। ऐसे में अमेरिका को अपना उल्लू सीधा करने का मौका मिल जाएगा। इसी को फूड पालिटिक्स की संज्ञा दी जाती है, जिसमें गोला बारूद की बजाए देशों को अधीन करने के लिए खाद्य आपूर्ति को हथियार बनाया जाता है।

फिदेल कास्त्रे ने इस बात की घोषणा काफी पहले ही कर दी थी कि अमेरिकी नीतियों के चलते खाद्य पदार्थों के दामों में तेजी आएगी। उन्होंने तो अमेरिका की तेल नीति की आलोचना करते हुए यहां तक कहा था कि इससे विश्व के कई भागों में अकाल जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाएंगी और लगभग तीन अरब लोग भूख और प्यास से दम तोड़ देगें। इस तरह की स्थिति के लिए कास्त्रे ने बुश प्रशासन के साथ अमेरिकी वाहन उद्योग को भी जिम्मेदार ठहराया है, क्योंकि इन्हीं के चलते खाद्यान्न फसलों की बजाए तेल उत्पादन वाली फसलों के उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था खाद्य और कृषि संगठन 'एफएओ' की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व भर में लगभग 37 देश आज खाद्यान्न की कमी का सामना कर रहे हैं। कैमरून, मिस्र तथा इंडोनेशिया जैसे देशों में तो अनाज को लेकर दंगे तक भड़क चुके हैं।

भारत में जट्रोफा प्रमोशन को देश की खाद्यान्न आत्मनिर्भरता को प्रभावित करने हेतु अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देशों की साजिश करार दिया जा रहा है, जिसका उद्देश्य स्थानीय खाद्य आत्मनिर्भरता के चक्र को विखंडित कर विकासशील देशों पर नियंत्रण की मुहिम को तेज करना है। 60 के दशक में 'फूड पालिटिक्स' से जुड़े अमेरिकी कांग्रेस के गोपनीय दस्तावेजों के खुलासे को देखें तो यह बात सही प्रतीत होती है। उल्लेखनीय है कि विश्व व्यापार संगठन, भारत समेत दुनिया के देशों पर प्रभुत्व कायम करने के लिए उनकी खाद्य उत्पादन की क्षमता को नष्ट करने पर तुला हुआ है। इस बात को बारीकी से समझने के लिए छत्तीसगढ़ का उदाहरण लिया जा सकता है। छत्तीसगढ़ को यहां पैदा होने वाली 20 हजार से भी अधिक धान की किस्मों के कारण धान के कटोरे की संज्ञा दी जाती है। इस आदिवासी बहुल प्रदेश में भले ही गरीबी हो लेकिन चावल की इन हजारों किस्मों की पैदावार के चलते यहां खाद्य असुरक्षा का संकट शायद ही कभी रहा होगा। आज इस प्रदेश में जट्रोफा रोपण को धान की किसानी को नष्ट करने की कवायद के तौर पर देखा जाने लगा है। यहां तक कि छत्तीसगढ़ के विजन-2010 में प्रदेश की पहचान माने जाने वाले शब्द 'धान का कटोरा' का एक बार भी उल्लेख नहीं किया गया है। इसके अलावा इस विजन-2010 के निर्माण में भी प्रदेशवासियों की बजाए 'प्राइस वाटर हाऊस कूपर्स' को चुना गया और योजनाकारों में जनप्रतिनिधियों, बुध्दिजीवियों तक को तरजीह नहीं दी गई। ऐसे में समझा जा सकता है कि इस तरह की साम्राज्वादी चालें किस तरह से स्थानीय सरकारों को भी अपनी बात मनवाने के लिए बरगला लेती हैं। छत्तीसगढ़ में तो इस तरह के प्रयास पहले भी किए जा चुके हैं, जिससे इस प्रदेश के भोले-भाले आदिवासियों को भूखे मरने की नौबत आ जाए। बासमती चावल पर तो अमेरिका पहले ही पेटेंट करवा ही चुका है। 2002 में बहुराष्ट्रीय कंपनी सिंजेन्टा के साथ रायपुर स्थित इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय के गुप्त समझौते को इसी बात का पर्याय माना जा सकता है, जिसमें बहुमूल्य धान की हजारों किस्मों को कंपनी के हवाले किया जा रहा था। बाद में छत्तीसगढ़वासियों के भारी विरोध के चलते इस समझौते को रद्द कर दिया गया। अभी हाल ही में विश्व बैंक ने भी इस बात की पुष्टि की है कि अमेरिका द्वारा मक्के से पेट्रोल के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किये जाने वाले एथनाल के निर्माण के कारण 2004 से 2007 के बीच मक्के की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। यही नहीं जैविक ईंधन के उत्पादन के कारण गेहूं, सोयाबीन और पाम आयल के दामों में भी वृध्दि हुई है। इस लिहाज से विश्व बैंक के अध्यक्ष राबर्ट जोएलिक के मुताबिक दुनिया भर में खाद्य आपूर्ति का चक्र प्रभावित होगा और गरीबी घटाने के प्रयासों को धक्का लगेगा। विश्व बैंक के मुताबिक बांग्लादेश में दो किलो चावल की कीमत एक आदमी की दैनिक आमदनी की करीब आधी है। यमन में गरीब अपनी दैनिक आमदनी का करीब चौथाई भाग भोजन पर व्यय करते हैं और गत तीन वर्षों के दौरान अनाज की कीमतों में 83 प्रतिशत की वृध्दि हुई है।

अमेरिका की विदेश मंत्री कोंडलिसा राइस ने कहा है कि भारत के मध्य वर्ग की बढ़ती संपन्नता के कारण विश्व में खाद्यान्नों के दाम बढ़े हैं। इस तरह की राजनीति तो एक विषय हो सकती है लेकिन ऐसे सैकड़ों तथ्य हैं जो जार्ज बुश तथा कोंडलिसा राइस को बयानों को सिरे से खारिज कर देते हैं, जिसमें उन्होंने भारत द्वारा अत्यधिक खाद्य उत्पादों के उपभोग की बात कही है। 70 के दशक में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने हरित क्रांति का दौर देखा था और आज दूसरी हरित क्रांति की बात कही जा रही है। खाद्यान्न संकट के लिए भारत से अधिक अमेरिका की उपभोक्तावादी नीतियां जिम्मेदार हैं। खेत में उगने वाले अनाज को गाड़ियों का ईंधान बनाना कितना महंगा पड़ सकता है, इसे समझने के लिए संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को संदर्भ के तौर पर देखें तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है। रिपोर्ट बताती है कि 50 लीटर का टैंक भरने में 232 किलो मकई या गन्ने का रस बर्बाद हो जाता है। रही बात भारत की तो हमारे यहां सलाना 76 मिलियन टन गेहूं और 96 मिलियन टन चावल का उत्पादन होता है। जबकि खपत सिर्फ 72 मिलियन टन और 91 मिलियन टन है। इस तरह से देखा जाए तो भारत अनाज उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर है और छोटे मोटे देशों का पेट भरने में भी सक्षम है।

ईमेल: umashankar19mishra@gmail.com

 

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