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भारतगाथा |
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विदुर की वाणी में
कृष्ण जैसा
ही तेज था |
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सूर्यकांत बाली |
जाति के कारण किनारे कर दिए जाने के बावजूद अपनी
प्रतिभा,
वाक्पटुता और कर्मशीलता के कारण विदुर कृष्ण के
पाले में खड़े नजर आते हैं। महाभारत कथा का शायद ही कोई महत्वपूर्ण
प्रसंग हो, जहां
विदुर उपस्थित न हों और अपनी राजनीतिक राय उन्होंने न दी हो।
महाभारत के अद्भुत कर्मशील और तनाव से भरे माहौल में विदुर का स्थान
कहां आता है?
विदुर को समझने के लिए उन्हें दो तरह से तुलना का
पात्र बना सकते हैं,
सिर्फ इसलिए कि तुलना समझने में सहायता करती है। अपनी जन्मकथा के कारण
विदुर पाण्डु और धृतराष्ट्र के पाले में चले जाते हैं तो अपनी प्रतिभा
और वाग्मिता के कारण विदुर की तुलना कृष्ण के अलावा और किसी से नहीं की
जा सकती। पहले जन्म कथा की बात की जाए।
विचित्रवीर्य की मृत्यु के पश्चात् कुरुकुल के सामने वंशनाश का खतरा
पैदा हो गया था। इस खतरे से वंश को बचाने के लिए शान्तनु की पत्नी
सत्यवती ने (पहले पति और फिर दोनों पुत्रें चित्रगंद और विचित्रवीर्य
की मृत्यु के बाद) व्यास की सहायता लेने का निर्णय किया। विचित्रवीर्य
की दोनों पत्नियों अम्बिका और अम्बालिका को उसने कहा कि वे नियोग
द्वारा व्यास से सन्तान की प्राप्ति करें। दोनों पुत्रवधुएं मान गई। पर
सत्यवती के मनोरथ की खण्डित पूर्ति ही हो सकी। व्यास चूंकि बहुत ही
भयावह नाक-नक्श के थे,
इसलिए उन्हें देखते ही अम्बिका ने आंखें बन्द कर
लीं तो उसे अंधा पुत्र पैदा हुआ, जो
धृतराष्ट्र कहलाया। उधर व्यास को देखते ही अम्बालिका का रंग पीला पड़
गया तो उसे पीले शरीर वाला पाण्डु नामक पुत्र पैदा हुआ। जाहिर है कि
सत्यवती जैसी तेजस्विनी महिला को इस तरह के विकलांग पोतों से संतोष
नहीं हुआ तो उसने एक बार फिर से अम्बिका को व्यास से नियोग की प्रेरणा
दी। इस बार
अम्बिका डर के मारे व्यास के पास गई ही नहीं और उसने अपनी एक दासी को
भेज दिया,
जिससे विदुर नामक पुत्र का जन्म हुआ। इस तरह नियोग
सन्तति के आधार पर विदुर धृतराष्ट्र और पाण्डु के भाई हुए,
पर दासी का पुत्र होने के
कारण उन्हें राजकाज के लायक नहीं माना गया।
शरीर
और बुध्दि दोनों दृष्टियों से विदुर अपने दोनों बड़े नियोगज भाइयों,
धृतराष्ट्र और पाण्डु से कहीं श्रेष्ठतर थे। पर
धृतराष्ट्र के अन्धा होने के कारण जब उसे राजा बनने के आयोग्य माना गया
तो विवश पीले शरीर वाले पाण्डु को राजा बनाया गया और शरीरिक दृष्टि से
सर्वांग सुन्दर और स्वस्थ विदुर की तरफ किसी की निगाह तक नहीं गई। अगर
विकलांग होने के कराण धृतराष्ट्र अक्षम था तो पाण्डु होने के कारण
पाण्डु को भी आयोग्य मान तीसरे भाई विदुर को राजा बना देना चाहिए था।
शरीर ही नहीं, बुध्दि की दृष्टि से भी विदुर
राजा बन सकते थे। पर उन्हें नहीं बनाया गया। क्यों?
उत्तर आसान नहीं।
उत्तर
आसान इसलिए नहीं क्योंकि अपने दोनों भाईयों के समान विदुर भी व्यास के
बल से ही पैदा हुए थे,
पर उन्हें कुलीनता की वैसी मान्यता नहीं मिली। तर्क
दिया जाता है कि उनकी माता चूंकि दासी थी,
इसलिए विदुर को कुलीनता का वह प्रमाणपत्र नहीं मिल पाया,
जो उनके दूसरे दोनों भाइयों को मिला। तो क्या इससे
यह निष्कर्ष निकाल लिया जाए कि महाभारत काल में वंशनिर्धारण में पिता
के साथ-साथ मां की भूमिका का अगर ज्यादा नहीं तो बराबर का महत्व था?
शायद इसलिए युधिष्ठिर,
भीम और अर्जुन पाण्डव (पाण्डु पुत्र) होने के साथ कौन्तेय (कुन्ती
पुत्र) भी कहलाए तो कृष्ण को वासुदेव (वसुदेव पुत्र) के साथ देवकीनन्दन
और यशोदानन्दन भी कहा गया। पर यदि मां का नाम इतना ही निर्णायक था तो
धृतराष्ट्र के सौ पुत्रें के नाम में उनकी मां गान्धारी का नाम क्यों
नहीं लोकप्रिय हो पाया? सचमुच इन प्रश्नों
के उत्तर नहीं मिल पाते और इन्हीं अनुत्तरित प्रश्नों के बीच एक महामति
विदुर इसलिए युवराज नहीं बन पाए, क्योंकि
उनकी मां दासी थी और पूरी महाभारत में वे क्षत्ता कहलाए,
जो उनका जाति वाची नाम था,
जिसका अर्थ है- चंवर डुलाने वाला। कितनी विडम्बना
है कि धृतराष्ट्र और पाण्डु के नियोग-भाई होने के बावजूद वे उनके बजाए
कर्ण के पाले में डाल दिए गए, क्योंकि
महाभारत कथा में विदुर के अलावा कर्ण ही ऐसे दूसरे पात्र हैं,
जो पाण्डवों के भाई होने के
बावजूद सूत यानी सारथी के हाथों पलने-पुसने के कारण हीन जाति के मान
लिए गए और इस कष्ट को आजीवन झेलते रहे।
पर
जाति के कारण किनारे कर दिए जाने के बावजूद अपनी प्रतिभा,
वाक्पटुता और कर्मशीलता के कारण विदुर कृष्ण के
पाले में खड़े नजर आते हैं। महाभारत कथा का शायद ही कोई महत्वपूर्ण
प्रसंग हो, जहां विदुर उपस्थित न हों और
अपनी राजनीतिक राय उन्होंने न दी हो। भीष्म जैसे राजनीति शास्त्र के
परमज्ञानी पितामह के मौजूद रहते हुए भी महाराज धृतराष्ट्र ने विदुर को
ही अपना मंत्री बनाया था इससे कौरव पक्ष को दो फायदे हो गए। एक यह कि
विदुर जैसे व्यक्ति से धृतराष्ट्र को सदा एक निष्पक्ष और उचित राय
मिलती रहती और दूसरा यह कि आयु में छोटा भाई होने के कारण विदुर की राय
को न मानने में धृतराष्ट्र हमेशा स्वतंत्र थे। पर अपनी राय न मानी जाने
की परवाह न कर विदुर ने अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र को हमेशा ठीक और दो
टूक सलाह दी। विडम्बना देखिए कि जब धृतराष्ट्र की राजसभा में जुआ खेला
जाना प्रारम्भ हुआ तो राजा की आज्ञा से विदुर ही युधिष्ठिर को जुए का
निमन्त्रण देने गए, पर जुआ खेले जाने के
दौरान ही विदुर ने जिस दबंग तरीके से जुए का विरोध किया और दुर्योधन के
चरित्र का पर्दाफाश किया, वह साहसी मन्त्री
के ही बस का काम था। तब विदुर ने दुर्योधन को कौवा और गीदड़ तक कह दिया
और धृतराष्ट्र को चेताया कि दुर्योधन के रूप में एक कौवा और एक गीदड़
उनके कुल का विनाश करने को पैदा हुआ है। दुर्योधन का परित्याग कर देने
की सलाह देते हुए विदुर ने धृतराष्ट्र को वह श्लोक सुनाया,
जो भारत के राजनीति शास्त्र का बड़ा ही लोकप्रिय कथन
बन गया है- त्यजेत् कुलार्थे पुरुषम्। ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे। आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् । अर्थात् एक व्यक्ति
का बलिदान देकर भी कुल को बचाना चाहिए, कुल
का बलिदान देकर भी ग्राम को बचाना चाहिए,
ग्राम की बलि चढ़ाकर भी राज्य बचा लेना चाहिए और खुद को बचाने के लिए
राज्य का भी बलिदान कर देना चाहिए। पर धृतराष्ट्र ने दुर्योधन नामक एक
व्यक्ति का बलिदान नहीं किया और अन्तत: राज्य से हाथ धोने पड़े। तभी जुए
के दौर में ही विदुर ने चेतावनी दे दी थी कि आज जिसे विनोद माना जा रहा
है, कल को इसी में से युध्द की उत्पत्ति
होने वाली है। परन्तु विदुर की न धृतराष्ट्र ने सुनी और न दुर्योधन ने।
विदुर की बात को तब भी कहां सुना गया, जब
भरी राजसभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र किया जा रहा था और विदुर हर कुछ
क्षणों के बाद पूरी सभा को बार-बार इस कुकृत्य के भयानक दुष्परिणामों
की चेतावनी दे रहे थे। ये तमाम घटनाएं तो बाद की हैं। पाण्डवों के
जन्मकाल से ही विदुर का स्नेह इन पितृविहीन बालकों से हो गया था और
उन्होंने बार-बार धृतराष्ट्र को समझाया कि पाण्डवों को उनका न्योयोचित
हिस्सा मिलना ही चाहिए। जब दुर्योधन ने भीम को पानी में फिकवा दिया था
तो विदुर ने ही कुन्ती को ढाढस बंधाया था। जब दुर्योधन ने वारणावत के
लाक्षागृह में पाण्डवों को उनकी मां कुन्ती के सहित जला देने की योजना
बनाई तो विदुर ने ही इस पूरे षडयन्त्र का पता युधिष्ठिर को भरी राजसभा
में एक ऐसी भाषा के माध्यम से दे दिया,
जो सिर्फ विदुर और युधिष्ठिर ही
जानते थे।
यानी
नीति,
उपदेश और कर्म के क्षेत्र में इतने सारे काम विदुर
ने किए। विदुर के इन्हीं महान नीतिव्याक्यों और कार्यों के कारण व्यास
ने उन्हें महाभारत में महात्मा विदुर बार-बार कहा है। विदुर की
नीतिमत्ता इतनी प्रमाणिक थी कि महाभारत में उपलब्ध उन्हीं के कथनों के
आधार पर आगे चलकर 'विदुर नीति'
नामक प्रसिध्द अर्थशास्त्र ग्रन्थ चलन में आ गया।
जब कृष्ण युध्द टालने का एक आखिरी प्रयास करते हुए युधिष्ठिर के दूत
बनकर धृतराष्ट्र से मिलने आए तो धृतराष्ट्र के पांवों तले से जमीन
खिसकने लगी। घबराहट के मारे उसने विदुर से पूरी रात इस बारे में
परामर्श किया कि कृष्ण के साथ कैसे बरता जाए। पर धृतराष्ट्र ने विदुर
की तब भी कहां मानी?
स्पष्ट
है कि विदुर अपने समय के एक ऐसे नीतिज्ञ थे,
जिनके कथनों में नीतिमत्ता है,
निर्भीकता है और प्रासंगिकता है। जिस समय जो कहना
चाहिए, वह विदुर ने कहा और ठीक उसी आधार पर
उनका नाम देश के महान राजनीतिवेत्ताओं में आ गया। फिर क्या कारण है कि
उन्हें वह स्थान और सम्मान नहीं मिल पाया,
जो अपने उन्हीं गुणों के कारण कृष्ण को मिला?
कारण स्पष्ट है। स्पष्ट,
निर्भीक और प्रासंगिक कथन में विदुर कृष्ण से किसी भी तरह से कम नहीं
ठहरते। पर जहां विदुर पीछे रह गए और कृष्ण आगे निकल गए,
वह क्षेत्र कर्म का है। विदुर आजीवन सक्रिय तो रहे,
पर विदुर के किसी कथन के पीछे कर्म का ठोस समर्थन
नहीं है, जबकि कृष्ण का कोई कथन बिना कर्म
के समर्थन के है ही नहीं। मसलन विदुर ने कहा कि जुआ नहीं खेला जाना
चाहिए, पर जुआ खेला गया और विदुर कुछ नहीं
कर पाए। विदुर ने कहा कि द्रौपदी का चीरहरण नहीं होना चाहिए,
पर चीरहरण हुआ और विदुर कुछ नहीं कर पाए। विदुर ने
कहा कि कृष्ण शान्तिदूत बन कर आ रहे हैं,
उसका सम्मान करना चाहिए। पर दुर्योधन ने कृष्ण को गिरफ्तार कर लेना
चाहा और विदुर कुछ नहीं कर पाए। और कृष्ण?
हर मौके पर कृष्ण ने कहा भी और कर भी दिखाया। जरासन्ध को मरवा दिया।
शिशुपाल को खुद ही मार दिया। दुर्योधन ने गिरफ्तार करना चाहा तो उसे
ऐसा हड़का दिया कि वह बेचारा हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। दुर्योधन बिना युध्द
के पाण्डवों को सुई भर जमीन देने को भी तैयार नहीं हुआ तो कृष्ण ने
युध्द ही करवा डाला। अर्जुन थोड़ा बिदकने लगा तो उसे पूरी गीता सुना दी
और युध्द में भी लगा दिया। और फिर? यही
कृष्ण थे, जो कौरवपक्ष के तीन
धुरन्धरों-भीष्म,
द्रोण और कर्ण की मृत्यु का कारण बने।
वस,
यह फर्क था। विदुर और कृष्ण दोनों नीतिज्ञ थे। पर
कृष्ण की नीति को कर्म का बल प्राप्त था,
जिसके दर्शन हमें विदुर के जीवन में नहीं होते। इसलिए कृष्ण पूर्णावतार
हो गए, जबकि विदुर का महत्व महान
नीतिशास्त्रकार के दायरे में जा सिमटा। पर चूंकि वे पूर्णावतार नहीं बन
सके तो क्या विदुर का महत्व कम मान लिया जाए?
ऐसा भला कैसे हो सकता है?
हर कोई पूर्णवतार नहीं हो सकता। वह तो कोई विरला ही
होता है। पर देश की सभ्यता के विकास में योगदान तो विदुर जैसों का भी
अद्भुत होता है,
जिन्होंने भारत को भीष्म के समकक्ष एक नीतिशास्त्र दे दिया। |