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परिदृश्य |
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गुलामी के विरुध्द नई लड़ाई की जरूरत |
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जवाहर लाल कौल |
स्वदेशी जागरण मंच की पहल पर स्वदेशी जुटान महत्वपूर्ण
प्रयास होने के बावजूद केवल एक लंबे अभियान का आरम्भ ही है। महत्वपूर्ण
इसलिए है कि पहली बार राष्ट्रीय दलों की सीमाओं से बाहर आकर बड़ी संख्या
में लोगों ने न केवल वर्तमान व्यवस्था में अनास्था व्यक्त की,
अपितु उसे बदलने का मन भी
बना लिया।
वर्तमान शासन व्यवस्था का विकल्प बनाने का काम एक राजनैतिक दल का चुनाव
जीतने जितना ही कठिन काम नहीं होता तो चिंता की कोई बात ही नहीं थी,
क्योंकि हमारे देश में राजनैतिक दलों ने अनेक बार
वैकल्पिक सरकारें बना ली हैं। वैकल्पिक व्यवस्था इस संविधान को छोड़ कर
एकदम नया संविधान बनाने जितना ही कठिन भी नहीं है। संविधान बदला भी और
उसे लागू भी कर लिया तो क्या अपने आप आर्थिक सोच भी बदलेगी?
नई अर्थव्यवस्था लागू हो जाएगी?
इसी व्यवस्था में हमने पहले मिश्रित अर्थव्यवस्था
चलाई, फिर नियंत्रित समाजवादी रास्ते पर चल
पड़े, फिर पूंजीवाद की ओर आकर्षित हो गए और
अब बाजारवाद और उपभोक्तावाद के भरोसे आगे बढ़ रहे हैं। इनमें,
संविधान तो बाधा बना नहीं। ये सब काम तो होंगे ही
लेकिन अकेले-अकेले यह सब काम वैकल्पिक व्यवस्था से बहुत छोटे हैं।
व्यवस्था परिर्वतन एक तरह का कायाकल्प है,
जिसमें देश और दुनिया, व्यक्ति,
परिवार और राष्ट्र को देखने,
सुख और समृध्दि की नई व्याख्या करने,
मनुष्य और उसके परिवेश में एक तारतम्य स्थापित करने
के लिए स्थाई योजना हो। उस कायाकल्प के लिए देर तक और दूर तक प्रयास
करने होंगे। जिस व्यवस्था में हम हैं वह भी एक दिन में तो विकसित नहीं
हुई। विदेशी आक्रमणों के कारण हमारा बहुत कुछ छिन चुका था,
नष्ट हुआ था या दबा दिया गया था। हमारे पराभव काल
में ही पश्चिम से एक जाति आई जिस ने हम पर शासन ही नहीं किया बल्कि हम
पर अपना दृष्टिकोण अपनी जीवन पध्दति और अपनी सभ्यता थोप दी। यह उनके
लिए आवश्यक था, क्योंकि जब तक हम अपनी
सभ्यता को भूल नहीं जाते, अपने संस्कारों को
नहीं छोड़ते तब तक पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति को कैसे स्वीकार करते। हमारे
मन-मस्तिष्क में अपनी परंपराओं और सोच के प्रति हीनता की भावना विकसित
करना आवश्यक था। हमारी अपनी पहचान मिटाने के लिए हमारे इतिहास को भी
पश्चिमी हितों के अनुरूप तोड- मरोड़ कर लिखना भी आवश्यक था जब अपना
इतिहास बोध धुंधला पड़ गया हो, अपने ज्ञान,
कला-कौशल, यंत्र-तंत्र
में भरोसा न रहा हो, जब प्रकृति के साथ
रिश्ते टूट गए हों, सभी प्रतीकों की
मूर्तिया भंग हो चुकी हों,
तो जो कुछ थोपा गया उसी को वरदान मानने की परिस्थति बन
गई।
धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के नाम पर जो प्रणाली भारत में आई वह धार्मिक और
जातीय भेदभाव,
नागरिक अधिकारों के हनन और हिंसा के माध्यम से थोपी
गई। वर्ण व्यवस्था को जातिवाद में बदलने में अंग्रेज समाजशास्त्रियों
का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अंग्रेज नौकरशाहों और समाजशास्त्रियों ने
ही उस समय लोगों के अधिकारों को सीमित करने की वकालत की जिस समय स्वयं
ब्रिटेन में नए-नए जनाधिकार प्राप्त किए जा रहे थे। दलील थी कि
'हम' और 'तुम'
अलग अलग तरह के लोग हैं। हमने लोकतांत्रिक अधिकारों
को हासिल करने के लिए सदियों से लडाई लड़ी है,
तुम्हें तो पता ही नहीं कि लोकतंत्र किस चिड़िया का
नाम है। महान समतावादी,
साम्यवाद के जनक कार्ल माक्र्स तक को लगा कि कुछ समय के
लिए भारत पर विदेशी शासन उचित ही है। अठारहवीं सदी से बीसवीं सदी के
मध्य तक हमारे अंदर अच्छा दास बनने के संस्कार डाले गए।
आजादी
के बाद भी हमारे बौध्दिक वर्ग में अच्छे हाकिम का अनुकरण करने की ललक
बनी रही। गांधीजी ने बहुत कुछ कहा बहुत कुछ लिखा,
लेकिन जिन्हें शासन पर अधिकार जमाना था उन्हें
आरम्भ से ही मालूम था कि उन्हें गांधी की बातों पर चलना ही नहीं है।
वरन इस बात पर तो बहस होती कि जिस आजादी को हम मांग रहे थे,
उसका स्वरूप कैसा होगा। उसमें भारतीय तत्व कितना
होगा उपनिवेश की कानून संहिता, औपनिवेशिक
शिक्षा प्रणाली,
उपनिवेश के अनुकूल अर्थ
और कृषि नीतियां और उपनिवेशवादी इतिहास सब कुछ स्वीकार किया गया।
ब्रिटेन अब वह महाशक्ति नहीं रही जिस के सम्राज्य पर कभी सूर्य डूबता
ही नहीं था। नई दुनिया का नायक अमेरिका हो गया। इसलिए स्वाभाविक है कि
हम भी हाकिम की जगह पर अमेरिका को ही रखें। परमाणु करार जैसे बहुर्चित
समझौतों की बात हम अलग रखें,
हमारे करोड़ों देशवासियों के भोजन और हमारी खेती के
जीवन-मरन से जुड़े एक समझौते का उल्लेख करने
से यह स्पष्ट हो जाएगा कि हमारे आत्मविश्वास को नष्ट करके किस प्रकार
हमारी अपनी सरकारें देश को अमेरिकी हितों के लिए बंधुआ बनाने को उत्सुक
रहती हैं। जुलाई 2005 में प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह अमेरिका के दौरे पर गए। वहां उन्होंने एक समझौते पर
हस्ताक्षर किया जिसे 'नालेज इनिश्येटिव इन
एग्रिकल्चर' यानी कृषि क्षेत्र में ज्ञान की
पहल कहते हैं। इस पहल को अगले साल राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भारत आकर
कार्यरूप दिया। कार्यन्वयन के लिए जो बोर्ड बना उसमें अमेरिका के तीन
बड़े निगम हैं, जिनका उद्देश्य भारत में
खाद्यपदार्थों के थोक ही नहीं खुदरा बाजार पर भी अधिकार जमाना है और
इसके लिए सभी सीमांत किसानों
को जमीन से
बेदखल करना है। ये हैं कारगिल,
मोनसांटो और वाल मार्ट। लेकिन यह ज्ञान किस बात का
होगा। माना गया है कि भारत के कृषि कर्म में कोई वैज्ञानिकता नहीं है।
खेती की अवैज्ञानिक और असंगत प्रणालियों को बदलकर अमेरिकी कंपनियां,
ऐसे संकर बीजों, ऐसे
उपकरणों, और कीटनाशकों के माध्यम से खेती
कराएंगी जिस से छोटे और मझोले किसान की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। खेती
औद्योगिक फसलों की होगी, जिन्हें इन्हीं
कंपनियों के माध्यम से विकसित रूपों में बाजार में लाया जाएगा। गेहूं,
चावल, दाल,
सब्जी का अभाव हो जाए तो ये कंपनियां अमेरिका और
आस्ट्रेलिया से मंगवाएंगी। गांव में छोटे किसानों के पास रोजगार नहीं
होगा तो उसके लिए शहर तो हैं, जिनका बेतरतीब
विस्तार हो रहा है। कोई भी थोडा सा ध्यान देकर यह समझ सकता है कि
करोड़ों किसानों की बरबादी,
आत्महत्या और विस्थापन का यह कारगर नुस्खा है। देश की
आत्मनिर्भरता को नष्ट करने का मतलब देश की स्वतंत्रता को भी नष्ट करना
होगा।
इसलिए
जब हम व्यवस्था को बदलने की बात करते हैं तो इसका तात्पर्य उस दासत्व
से आजादी भी है। स्वतंत्रता की यह लड़ाई उससे भी बड़ी और कठिन है जो हम
ने गांधीजी के नेतृत्व में लड़ी थी। तब जो गलती हुई थी वह अब नहीं होनी
चाहिए। भूल यह थी कि अंग्रेज शासकों को हटाने का उद्देश्य प्राथमिक बन
गया और अंग्रेजियत को हटाने के अभियान को गौण माना गया। लड़ाई के अंतिम
दौर में तो अंग्रेजियत बचाए रखने के भी प्रयास चले। आज की लड़ाई में
क्रम उल्टा होना चाहिए। सत्ता को हथियाना अपेक्षाकृत आसान होता है।
लेकिन जिस व्यवस्था में ऐसी सत्ता पनपती है उसे हटाना बहुत कठिन है।
उसके लिए केवल बौध्दिक बहस और विचारमंथन ही नहीं चाहिए,
जनसाधारण में यह समझ पैदा करना भी आवश्यक है,
जिसमें व्यवस्था बदलने की
आकांक्षा जगे और उसके लिए कर्मक्षेत्र में उतरने की प्रेरणा मिले।
इस
संदर्भ में अप्रैल में स्वदेशी जागरण मंच की पहल पर स्वदेशी जुटान
महत्वपूर्ण प्रयास होने के बावजूद केवल एक लंबे अभियान का आरम्भ ही है।
महत्वपूर्ण इसलिए है कि पहली बार राष्ट्रीय दलों की सीमाओं से बाहर आकर
बड़ी संख्या में लोगों ने न केवल वर्तमान व्यवस्था में अनास्था व्यक्त
की,
अपितु उसे बदलने का मन भी बना लिया। जुटान में सभी
लोग व्यवस्था परिवर्तन की आकांक्षा से नहीं आए थे। बहुत से लोग यह
समझने के लिए यहां उपस्थित थे कि जुटान के आयोजक और सक्रिय कार्यकर्ता
किस सीमा तक मान्यता प्राप्त राजनैतिक दलों को नकार कर अपना अलग रास्ता
चुनने को तैयार हैं। कुछ लोग बाजारवाद के पक्षधर थे,
जिन्हें चिंता थी कि कहीं बाजार के वर्चस्व और उसके
संचालकों को गंभीर चुनौती तो नहीं मिल रही है। लेकिन कुछ लोगों को इस
बात की जल्दबाजी थी कि गोविंदाचार्य आंदोलन की कमान संभाल लें।
उद्देश्यों और रूचियों की विविधता का सार्थक पहलू यह था कि राजनैतिक और
सामाजिक क्षेत्र में काम करने वालों ने इस जुटान को अनसुना या अनदेखा
नहीं किया अपितु उसे एक महत्वपूर्ण घटना मानकर उसे अपने-अपने दृष्टिकोण
से परखने का प्रयास किया। यह जुटान केवल शुरूआत है क्योंकि किसी एक
सम्मेलन में पूरे राष्ट्र को संचालित करने वाली व्यवस्था का विकास नहीं
किया जा सकता है। इसे बौध्दिक, भावात्मक और
व्यावहारिक स्तरों पर विकसित किया जाना होगा। बौध्दिक स्तर पर हमें
विश्वव्यापी बाजारवाद की बारीकियों को समझकर उसके घातक परिणामों की
व्याख्या करनी होगी। भूमंडलीकरण और तकनीक से अपने रिश्ते परिभाषित करने
होंगे। भावात्मक स्तर पर हमें जनमानस में अपने देश,
अपनी संस्कृति और सभ्यता के प्रति लगाव पैदा करना
होगा। यही लगाव स्वतंत्रता की लड़ाई में लोगों को शक्तिशाली व्यवस्था के
साथ टकराने और बलिदान देने के लिए प्रेरित करता रहा। व्यवहारिक स्तर पर
हमें अपने ग्रामों, अपने खेतों और किसानों
की दुर्दशा पर रोने तक सीमित रहने के बदले,
उसे साफ तौर पर वर्तमान व्यवस्था के
परिणाम के रूप में पेश करना होगा। हमें लोगों को यह बताना होगा कि देश
में किसान और छात्र इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्या क्यों करते हैं। साफ
है कि यह एक दो मास का काम नहीं है। आंदोलन ऊंचाई से लुढ़कने वाले पत्थर
की तरह होते हैं। अपनी गति से ही ऊर्जा पैदा करते हैं। आंदोलन को
धकेलने की आवश्यकता नहीं पड़ती अगर उस की दिशा सही हो और उसके मुद्दे
ठोस हों। स्वदेशी जुटान चारों और व्याप्त असंतोष और रोष को एक दिशा
देने का सार्थक प्रयास रहा। यह आजादी का दूसरा आंदोलन होगा जो पहले से
अधिक गम्भीर और दूरगामी हो सकता है।
संपर्क:
301, रामा अपार्टमेंट,
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दिल्ली |