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जून,  2008

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कहां खो गया गांव सलोना!

सन्त समीर

गांव के लोगों में अपनत्व था, तो धन-सम्पत्ति की वजह से कोई भावनात्मक दूरी नहीं पैदा हो सकती थी। लेकिन इस दौर में उपभोक्तावाद ने ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं जुटा लेने की मानसिकता पैदा कर दी तो गांव के लोग भी त्याग-संयम की भाषा भूलकर स्वार्थ साधने में लग गए हैं। स्वार्थ के भोगवादी रूप ने पड़ोसियों के साथ आत्मीय संबंधों में दरार पैदा कर दी है।

'कहां खो गया गांव सलोना, और उसकी नूरानी धूप' के रूप में व्यक्त शायर की वेदना के स्वर वर्तमान गांवों की दशा पर बहुत कुछ कह जाते हैं। सचमुच, बैलों के गले की घंटियां अब कम सुनाई देती हैं। चौपाल सूने हो गए हैं और दिन भर का काम निपटाकर शाम की अलमस्ती में किस्सागोई से नई पीढ़ी को संस्कार के पाठ पढ़ाना भी लोग भूल से गए हैं। सदियों के अनुभव समेटे सिर्फ कुछ शब्दों के 'मसल' सुनाने की बुजुर्गों की लाग-डांट भी अब गाहे-बगाहे ही सुनाई देती है। रोम-रोम में वीरता के भाव भरने वाले 'आल्ह-खण्ड' की गूंज और 'बिरहा' की स्वरलहरियां तो नई पीढ़ी के लिए जैसे अनजानी ही हैं। पनघट पर चहल-पहल नहीं रही तो 'पद-अपद' सुनाने की महिलाओं की जुगलबंदी भी नहीं सुनाई देती। खेत-खलिहान की धूल-मिट्टी में कंचे और कौड़ियां खेलते बच्चों की किलकारियां तक बस्ते के बोझ तले जैसे दब सी गई हैं।

आज के गांवों की तस्वीर कुछ ऐसी ही है। नए विज्ञान और तकनीकी के पहियों से बनी आधुनिक विकास की गाड़ी गांवों की ओर बहुत कुछ लेकर आई है तो बहुत कुछ इसने गांवों से बाहर भी कर दिया है। इस विकास के चलते गांवों में सुविधाओं के कुछ छींटे यदि पड़े हैं तो यहां की दयालुता, नि:स्वार्थता, निश्चितता, अपनापन तथा सामूहिकता के भाव के अगाध भंडार से बहुत कुछ खाली भी हो गया है। विकास की आधुनिक बयार ने गांव के लोगों की लालसाएं इतनी तीव्रता से जगा दी हैं कि उनकी सुकून भरी जिंदगी में खलबली मच गई है। अपने हिस्से की आधी रोटी से किसी की भूख मिटा देने में सुकून महसूस करने के कभी के संस्कार अब दूसरों का हिस्सा हड़प जाने के स्वार्थ में बदल गए हैं। मनोरंजन के साधन के नाम पर घर-घर में पहुंचते जा रहे टेलीविजन ने मनोरंजन के असली साधनों को निगल लिया है। आज के सूचना माध्यमों ने गांव के बच्चों को जिस दुनिया में पहुंचा दिया है वहां अब वे गिल्ली-डंडा, कबड्डी, खो-खो और सुटुर्र जैसे देशी और मुफ्त के खेल खेलना भूल गए हैं और महंगे बैट, बाल और पैड के साथ अंग्रेजी क्रिकेट की बैटिंग और फील्डिग में रम चुके हैं। इसके अलावा टेलीविजन जैसे माध्यमों ने गांव के लोगों में जागरूकता तो बढ़ाई है, पर उपभोक्तावाद और शहरी जीवन-शैली के प्रति ललक जगाने का काम कहीं ज्यादा किया है।

एक समय था जब नए साधनों से दूर रहते हुए अपनी कठिन जिंदगी में भी गांव के लोग एक दूसरे के सुख-दु:ख का खयाल करके चलते थे। तब गांव का धनी आदमी भी गरीब बड़े-बुजुर्गों को काका, चाचा या बाबा का ही सम्मान देता हुआ दिखाई देता था और गरीब से गरीब आदमी भी 'पद' (उचित) की बात पर धनी आदमी को फटकार लगा सकता था। गांव के लोगों में अपनत्व था, तो धन-सम्पत्ति की वजह से कोई भावनात्मक दूरी नहीं पैदा हो सकती थी। लेकिन इस दौर में उपभोक्तावाद ने ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं जुटा लेने की मानसिकता पैदा कर दी तो गांव के लोग भी त्याग-संयम की भाषा भूलकर स्वार्थ साधने में लग गए हैं। स्वार्थ के भोगवादी रूप ने पड़ोसियों के साथ आत्मीय संबंधों में दरार पैदा कर दी है। व्यवहार में काइयांपन और बोल-बात-मुस्कुराहटों में शातिरपना गहरे तक घुल गया है। अब गांव के सीधे-सादे आदमी को भी यह चिन्ता सताती रहती है कि कहीं पड़ोसी उससे आगे न बढ़ जाए। साधन-सम्पन्नता की इस भागमभाग में जिसके पास कुछ इकट्ठा हो जाता है उसके तो जैसे पांव ही जमीन पर नहीं पड़ते। इस दौर का धन-कुबेर गांव में रहते हुए भी गांव से कट जाता है। उसका आदर्श टेलीविजन और फिल्मों में दिखने वाली शहरी जीवनशैली होती है और वह गांव के अपने घर को भी वैसे ही सुविधासम्पन्न बनाना चाहता है। कुछ बरस पहले तक हाल यह था कि गांव के साधारण और बहुत धनी लोगों के रहन-सहन में कोई खास फर्क नहीं हुआ करता था, लेकिन अब तो धन की आमद होते ही पहनावे तक में फर्क दिखाई देने लगता है।

आधुनिक जीवनशैली की बनावटी जरूरतों ने एक ऐसा बनावटी तनाव पैदा कर दिया है कि गांवों की अलमस्ती गायब हो गई है। कभी-कभी बचपन के कुछ दृश्य याद आते हैं। तब गन्ने की पिराई बैलों से ही होती थी। बड़ा गांव हुआ तो टोले बंट जाते थे, नहीं तो छोटे गांवों में एक कोल्हू ही काफी होता था। जैसे-जैसे जिसके पास ईंधन की तैयारी होती, वैसे-वैसे बारी-बारी से एक-एक घर की गन्ने की पिराई की जाती। हर घर से लोग गन्ना छिलाई के लिए शामिल होते। गन्ने की पिराई चाहे जिसकी हो, पर बैल भी सबके ही बारी-बारी से कोल्हू में चलाए जाते। इधर कोल्हू से रस तैयार होता और उधर गुल्लौर से धुआं उठना शुरू हो जाता। शाम ढलते-ढलते गांव के क्या बूढ़े क्या बच्चे, सब ही सामूहिक बतकही की चौपाल सजाने गुल्लौर में जमा हो जाते।

जाड़े के दिन तो खैर होते ही थे; सो, गांव के बच्चे आलू और ताजी मटर की फलियां भूनने और 'लुका-छिपी' खेलने में मगन रहते। और यदि कभी कोई बाबा या दादा से कहानियां सुनने की फरमाइश कर बैठता तो माहौल की रौनक ही कुछ और हो जाती। 'किस्सा तोता-मैना', 'रानी सारंगा-सदाबृज', 'बाला लखंदर', 'आल्हा-ऊदल', 'कौआ-हकनी' जैसी ढेरों कहानियां मुझे इसी तरह के माहौल में सुनने को मिली थीं और इनके कई सार्थक संस्कारों को मैं अपने ऊपर अभी तक महसूस करता हूं।

अजब किस्सागोई थी वह। कहानियां खास अंदाज और लय में सुनाई जाती थीं। यदि होली का त्योहार आने में एकाध माह बाकी हुआ तो किसी-किसी दिन ढोल की थाप पर फागुन के गीतों की महफिल भी जम जाती। गुड़ की हर नई 'पाग' (पाक) का स्वाद लेते हुए गीत और किस्सागोई के बीच कब पहर भर रात बीत गई और आखिरी 'पाग' उतरने के साथ काम खत्म हुआ, यह पता ही नहीं चलता था।

ऐसे हुआ करते थे बचपन के वे दिन, जब किसी एक घर पर आ पड़ा काम का बोझ भी पूरे गांव के लिए मनोरंजन का सामूहिक उत्सव बन जाता था। तीज-त्योहार से लेकर शादी-ब्याह तक हर किसी मौके पर गांव के लोगों का आपसी मनमुटाव भुलाकर एकजुट हो जाना एक विराट सांस्कृतिक विरासत की ही पहचान है, लेकिन दुर्भाग्य से अब हमारे गांवों की सांस्कृतिक पहचान और परम्पराएं अपनी अस्मिता खोने लगी हैं।

कुछेक दशक पहले ही गांवों में आपसी सामंजस्य इतना था कि आपस के झगड़े गांव की पंचायत के स्तर पर सुलझ जाते थे। तब पंचों का फैसला ही सिर-माथे होता था। मूल्यबोध इतना गहरा था कि पंच चुन लिए जाने के बाद अपने विरोधी को भी न्याय दिलाना आत्मगौरव का अहसास दिलाता था। मुंशी प्रेमचन्द की 'पंचपरमेश्वर' कहानी वास्तव में तब के गांवों में प्रवहमान उदात्तभावों से बेहतर परिचय कराती है। लेकिन अब के गांवों में स्वार्थ इतने गहरे तक उतर आया है कि नैतिकता मजाक की चीज बनने लगी है। इस सबके चलते न अब वैसे पंच रहे और न वैसी पंचायत। नतीजा यह हो रहा है कि छोटे-छोटे विवादों पर भी बन्दूकें तन जाती हैं और मामला कोर्ट-कचहरी से नीचे नहीं सुलझता।

आज के गांवों में राजनीतिक जागरूकता तो आई है, पर उसके साथ वैमनस्यता का एक नया माहौल भी पैदा हो गया है। अब राजनीतिक पार्टियां सम्प्रदायों के मानिन्द ही दिखने लगी हैं। पहले लोग भले ही कम जागरूक थे, पर इतना चरित्र तो था कि चुनाव का समय आने पर एकर् कत्तव्यभाव के साथ वोट डालते जाते थे। गांव की महिलाएं तो समूहों में लोकगीत गाते हुए ही चुनाव केन्द्र तक पहुंचती थीं। लेकिन अब वोट देने के लिए जाते लोगों का तेवर देखकर ऐसा लगता है जैसे कि वे युध्द क्षेत्र में जा रहे हों। वैमनस्यता और स्वार्थ इतने प्रभावी हो चुके हैं कि अब दूसरे की मुसीबत में काम आने के लिए भी लोग अपने स्वार्थ के मौके ही ज्यादा तलाशते हैं। अंग्रेजों द्वारा इस देश को कंगाल कर दिए जाने के बाद भी अभी कुछ बरस पहले तक हमारे गांवों में ऐसी स्थिति तो नहीं ही थी कि किसी गरीब को आत्महत्या करनी पड़े। तमाम कुरीतियों और अंधविश्वासों के बावजूद गरीब को रोटी देना गांव का अमीर अपनार् कत्तव्य मानता था। लेकिन अब एक तरफ अमीरी के नए टापू खड़े हो रहे हैं तो दूसरी तरफ गरीबों का जीना और मुश्किल हो रहा है; और वे, अपने दु:ख-दर्द के साथ इतने अकेले पड़ गए हैं कि आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझता।

भूले-बिसरे ठहरे हुए से अतीत को याद करते हुए और किसी फिल्म की तेज रफ्तार रील की तरह भागते वर्तमान को देखते हुए कभी-कभी ऐसा लगता है कि हतप्रभ हो उठने के अलावा हमारे पास और कोई चारा नहीं रह गया है। अब तो किसी के मुंह से यह सुनकर कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, मन एक बार विषाद से भर उठता है।

संपर्क : ए-139/2, शिव मंदिर मार्ग, मंडावली, फाजलपुर, नई दिल्ली- 92

 

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन