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जून,  2008

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मां गंगा की पुकार, जागो फिर एक बार

हरपाल सिंह

मां गंगा के अस्तित्व के समक्ष आज चुनौतियां गंभीर हैं इसलिए संवाद, सहमति, सहकार और संघर्ष की आवश्यकता है। अगर मां गंगा समाप्त हो गईं तो समस्याएं और भी जटिल हो जाएंगी। बड़ी संख्या में लोग दाने-दाने के मोहताज हो जाएंगे। अत: आज आपसी मतभेदों को भुलाकर, गांधी के एक से ग्यारह होने की नीति को अपनाकर दुश्मनों से मां गंगा को मुक्त कराना है। आखिर यह मसला हम सब के जीवन से जुड़ा है।

गंगा सिर्फ एक नदी नहीं है बल्कि भारतीय चिन्तन और संस्कृति में इसे मां माना गया है। गंगा जी के प्रति श्रध्दा हर भारतीय की नैसर्गिक प्रवृत्ति है। क्योंकि जन्म से मृत्यु तक का कोई भी संस्कार मां के बगैर पूरा नहीं होता। गंगा जल हमारे लिए सामान्य जल नहीं जिसका मूल्य और महत्व उसके पीने-नहाने, तैरने, सिंचाई, बिजली, औद्योगिक  नगरीय उपयोग से नापा जाए। सही अर्थों में कहें तो यह जल धारा नहीं अपितु अतुलनीय अध्यात्मिक उत्थान की स्रोत दैवी धारा है। जो कि हमारी आत्मा को भी अंत समय में मोक्ष के दरवाजे तक ले जाती है। स्वतंत्रता के बाद पश्चिमी संस्कृति की मानसिकता को अंगीकार कर गुलाम बने हमारे देश के कर्णधारों ने भारतीय आस्था और विशिष्ट पहचानों को साम्प्रदायिक कहकर उनके महत्व को कम करने की भरसक कोशिश की। सियासत के धुरंधरों ने आर्थिक-भौतिक विकास को जीवन और राष्ट्र का एक मात्र ध्येय बताकर हमारे आस्था स्रोत गंगा, गौ, गायत्री, गीता और गुरू पर एक-एक कर योजनाबध्द प्रहार शुरू कर दिया। 

पिछले कुछ वर्षों से उत्तराखण्ड जल विघुत निगम के अनुसार गंगा, यमुना, शारदा व उनकी सहायक नदियों पर एक मेगावाट तक 24, एक से पांच मेगावाट तक 41, पांच से 25 मेगावाट तक 36, पच्चीस से सौ मेगावाट तक 24, सौ से 200 मेगावाट तक ग्यारह, 250 से 500 मेगावाट तक तेरह, पांच सौ मेगावाट से ज्यादा वाले आठ अर्थात कुल मिलाकर 157 जलविद्युत परियोजनाओं पर काम हो रहा है। जिन्हें सन् 2012 तक पूरा किया जाना है। अकेले भागीरथी पर एक के बाद एक दस बांध हैं। अब अगर नदियों के हिसाब से आंकड़ों पर निगाह दौड़ाई जाए तो यह पता चलता है कि भागीरथी और उसकी सहायक नदियों पर 18, यमुना पर पंद्रह, शारदा पर 19, अलकनंदा पर आठ, धौली गंगा पर आठ, रामगंगा पर एकपिंडर पर तीन, गंगा कैनाल पर एक, गृथी गंगा पर एक, ऋषिगंगा पर एक, जाड़गंगा पर तीन, मंदाकिनी पर एक, नयार पर एक। इसका अर्थ यह हुआ कि इन नदियों को पहाड़ में कहीं पर भी बहती अवस्था में नहीं छोड़ा जाएगा। अभी तक जो भी बांध बने हैं, उनमें से कोई भी घोषित दावे जितनी बिजली नहीं पैदा कर पा रहा। बल्कि पर्यावरण के विनाश में वे अहम भूमिका निभा रहे हैं। इस वजह से भारतीय सुरक्षा का प्रतीक हिमालयी ग्लेशियर प्रतिवर्ष 23 मीटर की दर से पीछे जा रहा है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 2030 तक ग्लेशियर लुप्त हो सकता है।

इन बांधों ने अभी तक 5.5 करोड़ लोगों को विस्थापित किया है। 44 लाख हेक्टेयर जमीन डूबी है। विस्थापितों के पुनर्वास योजनाओं को भी सत्ताधीशों ने लुटने से नहीं छोड़ा। वहां की फटी दिवारें इस बात की गवाह हैं कि भ्रष्टाचार की वजह से विस्थापन की मार झेल रहे लोगों का भला नहीं हो पाया। उत्तरकाशी शहर के एक बडे हिस्से के समक्ष मनेरी भाली-2 के जलाशय से खतरा उत्पन्न हो गया है। अभी वहां सुरक्षा दीवार भी नहीं बनी है। लगभग 50 गांवों के जल स्रोत सूख गए। इन गांवों के लोग पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहे हैं। इन परियोजनाओं में अनुमानित व्यय राशि से दो लाख करोड़ से ज्यादा निवेश किया गया। पर इसके बावजूद दावे के अनुरूप बिजली पैदा नहीं हो सकी और ना ही सिंचाई हो पाई। देश भर के बांधं का पूर्व अनुभव यही बता रहा है कि बड़े बांधो से घोषित लाभ नहीं हुए हैं।

ये जानने के बावजूद एक पर एक विनाशकारी परियोजनाएं बनाई जा रही हैं। हाल ही में चर्चा मे 'गंगा एक्सप्रेस वे परियोजना' आई। जिसकी व्यय राशि 40000 करोड़ है। जो कि नोएडा से बलिया तक 1047 कि.मी. की दूरी तय करेगी। जिसमें 30 हजार एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा। जिससे 500 बड़े उद्योग, 7000 मध्यम एवं लघु उद्योग, 35 आई. आई. टी., 20 पोलिटेक्निक, दस इंजीनियरिंग और पांच मेडिकल कालेजों की स्थापना होगी। इसकी वजह से 5 लाख 21 हजार लोग विस्थापित होंगे। आंकड़े पर ध्यान दें तो बांध और एक्सप्रेस वे की वजह से कुल मिलाकर 5 करोड़ 55 लाख 21 हजार लोग विस्थापित हो जाएंगे। इस क्रम में तकरीबन पांच लाख हेक्टेयर भूमि बर्बाद हो जाएगी। अनुमान है कि इस एक्सप्रेस वे के बनने के बाद अतिरिक्त डेढ़ लाख हेक्टेयर जमीन पर जल बहाव का नकारात्मक असर पड़ना तय है।

जरा सोचिए कि तीन-चार बड़े नगरं और कुछ छोटे उपनगरों के उद्योग धंधों के रासायनिक कचरे और गंदे नाले से दूषित गंगा की सफाई में 1500 करोड़ खर्च होने के बाद भी मां गंगा का ये हाल है तो अगर सभी परियोजनाएं पूरी हो गईं और अविरल धारा पूरी तरह रूक गई तो क्या हाल होगा? 2500 कि.मी. दूरी तय करने वाली इस नदी का क्या होगा? इससे जुड़े 65 करोड़ की आबादी, जिसमें किसानों, मछुआर, मल्लाहों और व्यापारियों का क्या होगा? गंगोत्री, हरिद्वार, प्रयाग, वाराणसी, गंगासागर जैसे धार्मिक स्थलों का क्या होगा? ऐसा ही रहा तो मां गंगा नालों में तब्दील होकर रेत की टापुओं जैसी हो जाएगी। फिर गंगाबेसिन के बचने का सवाल की कहां से पैदा होता है।

यहां यह बताना जरूरी है कि महामना और अंग्रेजों के बीच 20/04/1917 को गंगा प्रवाह को मुक्त बनाए रखने के मसले पर सहमति बनने के बाद आदेश संख्या-1002 जारी किया गया था। जिसके मुताबिक मां गंगा की अविरलता की रक्षा की बात कही गई थी। जिस समझौते का एक विदेशी सरकार तक ने सम्मान किया उसे आज हमारे नेता ही ताक पर रख रहे हैं। साथ ही पर्यावरणविदों की चेतावनियों की भी अनदेखी की जा रही है। मां गंगा के प्रति हो रहे विदेशी षडयंत्रें को भांपकर गंगा के अस्तित्व की रक्षा के लिए अलख जगाने वालो में एक प्रमुख नाम गुरूदास अग्रवाल का है। पिछले दिनों प्रो. गुरूदास अग्रवाल ने घोषणा की है कि आगामी गंगा दशहरा यानी 13 जून 2008 से उत्तरकाशी में गंगा की सुरक्षा, संवर्द्वन और संरक्षण को लेकर आमरण अनशन करेगें। प्रो. अग्रवाल की आयु 75 साल है। उन्होंने बहुत सोच विचार कर ही 14 अप्रैल 2008 (रामनवमी) के दिन यह घोषणा की। अधिकांश लोग प्रो. गुरुदास अग्रवाल के बारे में नहीं जानते हैं। बताते चलें कि वे उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक गांव में जन्में। प्रारम्भिक शिक्षा मुजफ्फरनगर में ही हुई। उन्होंने रूड़की विश्वविद्यालय (आई.आई.टी.) से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक किया। उसके बाद उन्होंने बर्कले विश्वविद्यालय के कैलिफोर्निया से एम.एस. और पी.एच.डी. की उपाधी ली। फिर आई.आई.टी. कानपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग छात्र कल्याण संकाय के डीन भी रहे। सन् 1981 से सन् 1983 तक वे सेन्ट्रल पोल्यूशन बोर्ड के प्रथम संस्थापक सदस्य सचिव रहे। पर्यावरण संरक्षण को लेकर प्रदेश और केन्द्र सरकार ने जो समितियां बनाईं, उसमें वे सदस्य रहे। प्रो. अग्रवाल ने हमेशा पर्यावरण को भारतीय चिंतन और परंपरा से देखने पर बल दिया। पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से वे चित्रकूट में गांधी ग्रामोद्योग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है। आई.आई.टी. और चित्रकूट मे रहते हुए उन्होंने सैकड़ों छात्र-छात्रओं को पर्यावरण रक्षा की प्रेरणा दी, पर्यावरण को नई दृष्टि से देखने की समझ दी। तीस-चालीस वर्ष बाद भी इनके छात्र इनसे प्रेरणा पाते हैं और सम्मान करते हैं। ऐसे शिक्षक विरले होते हैं। इनके ही शिष्य स्वर्गीय अनिल अग्रवाल ने इन्हीं की प्रेरणा से सेन्टर फार साइंस एण्ड इन्वायरमेंट की स्थापना की। इस संस्था ने पर्यावर के संदर्भ मे अनेक अध्ययन किए हैं। इसने पर्यावरण को लेकर अनेक वार्षिकी निकाली और हाल में कोका कोला को लेकर बड़ा आंदोलन छेड़ा।

प्रो. गुरूदास अग्रवाल कहते हैं कि एक भारतीय व्यक्ति भारतीय पध्दति से जीए और भारतीय पध्दति से सोचे तो उसमें एक मौलिकता रहती है। शायद यही वह सोच है जिसने इनके हृदय को झकझोर दिया। जिस गंगा को हम मां मानते रहे हैं, उसके साथ हो रहे अत्याचार को बर्दाश्त करना बुझदिली है। आज जरूरत इस बात की है कि हम सब एकजुट होकर गंगा को बचाने के लिए आवाज बुलंद करें। जमीनी स्तर पर कुछ ना कुछ करते हुए गंगा मईया की रक्षा में संघर्षरत लोगों और संगठनों के साथ आज कदमताल करने की आवश्यकता है। तभी सकारात्मक नतीजा आ पाएगा। क्योंकि गंगा को बचाने की इच्छा रखने वाले अगर संगठित रूप से एक साथ संघर्ष करें तो बढ़ी हुई ताकत के जरिए हम अपने मकसद में कामयाब हो सकते है। हमारे पास पवन उर्जा, सौर ऊर्जा, धराट उर्जा और जैविक उर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोत हैं। इसके बावजूद भी हम भविष्य के खतरों को जानते हुए भी अनजान बनकर विश्व की अमूल्य धरोहर 'गंगा' का नाश करने पर तुले हैं। यह समय गंगा जी के प्रति श्रध्दा रखने वालों के लिए चुनौती का है। प्रो. अग्रवाल की मुख्य मांग यही है कि गोमुख से धरासु तक मां गंगा की अविरल धारा से छेड़छाड़ न की जाए और उसकी सुरक्षा और संवर्ध्दन की व्यवस्था सुनिश्चित हो। प्रश्न ये उठता है कि आखिर प्रो. अग्रवाल के इस पुनीत कार्य में कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलने और सरकार पर जल्द से जल्द प्रभावी जन दबाव डालने का स्वरूप क्या हो? क्या हम जनजागरण रैली निकाल सकते हैं? क्या हम हस्ताक्षर अभियान, पोस्ट कार्ड अभियान, दीवार लेखन, पर्चा वितरण, क्रमिक अनशन, जेलभरो आन्दोलन चला सकते हैं? क्या हम सब उत्तरकाशी में आंदोलन को गति देने में अपना वक्त लगा सकते हैं? यकीन मानिए अगर हम सबने ऐसा कर दिया तो हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे और मां गंगा को मिटाने वाली पूंजीपरस्त ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दे पाएंगे।

आशा ही नहीं बल्कि भरोसा है कि आप बगैर समय गंवाए अपने-अपने क्षेत्र में गंगा मां की रक्षा का अलख जगाकर सरकार एवं गंगा मईया के हत्यारं को सबक सिखा देंगे। आखिरकार यह मसला हम सबके अस्तित्व से जुड़ा है। आइए, जाति-धर्म-सम्प्रदाय से ऊपर उठकर मां गंगा कि रक्षा के लिए कदम से कदम मिलाकर चलें और साथ संघर्ष करें। हमारी जीत निश्चित है।

ईमेल: harpaljeesewak@gmail.com

 

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन