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जून,  2008

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राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर

राजीव लोचन पाण्डेय

गरीब विरोधी इस आयोजन के फेर में पहले ही बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हो गए हैं। दिल्ली के झुग्गी और गरीब बस्तियां स्वरोजगार के लिए जानी जाती रही हैं। परन्तु अब इन्हें गंदगी और प्रदूषण फैलाने के नाम पर बन्द कराने का काम किया जा रहा है।

राष्ट्रमंडल खेल 2010 के आयोजन के कई बुरे पहलू सामने आ रहे हैं। दिल्ली के कायाकल्प की बड़ी योजनाएं बनाई गई हैं। राजधानी को सजी संवरी और विदेशों की तरह बनाने के सुखद खयालों में यह पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है कि दिल्ली की कुछ शास्वत समस्याएं हैं। जैसे बिजली, पानी, बढ़ती हुई आबादी और रोजगार की समस्या। इसके अलावा यह भी नजर अंदाज किया जा रहा है कि एक बड़े तबके के हाथ से रोजी-रोटी जाने वाली है।

सनद रहे कि बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड जैसे गरीब राज्यों की एक बड़ी आबादी यहां रोजी-रोटी के लिए रिक्शा, रेहड़ी, पटरी आदि के कामों में लगी है। उन्हें पूरी तरह विस्थापित हो जाना पडेग़ा। वहीं अब पटरी पर चाय, पराठे सब्जी और फल बेचने वालों पर भी शामत आएगी। अभी कुछ दिनों पूर्व उच्च न्यायालय के आदेश से चांदनी चौक इलाके में रिक्शा के परिचालन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इससे सैकड़ों रिक्शा चालक बेरोजगार हो गए। पुरानी खटारा बसों की जगह अत्याधुनिक बस और रेडियो टैक्सी, आटो को चलाए जाने की योजना है। इस व्यवसाय में भी बड़ी संख्या में लोग विस्थापित होंगे।

राष्ट्रमंडल खेल के मद्देनजर होने वाले निर्माण कार्य में मजदूर और युवा वर्ग के लिए रोजगार की संभावना देखी जा रही थी। परन्तु बड़ी संख्या में होने वाले होटल निर्माण में निवेशकों की उदासीनता ने मंसूबों पर पानी फेर दिया है। वहीं फ्लाईओवर और अन्य निर्माण में मजदूरों की जगह अत्याधुनिक मशीनों ने अपनी उपयोगिता ज्यादा साबित की है। राज्य और केन्द्र सरकार की ओर से घोषणाओं का सिलसिला चल पड़ा है। हर स्तर से बदलाव और विकास के मंसूबे बांधे जा रहे हैं। परन्तु हकीकत तो यह है कि शुरूआती उत्साह के बाद सरकारी महकमा अपने पुराने कार्य शैली पर लौटने लगा है। आयोजन में महज तीन वर्ष ही शेष बचे हैं और निर्माण् कार्य अभी शुरू भी नहीं हो पाया है। गौरतलब है कि इस खेल महोत्सव के आयोजन पर सरकार ने अपनी ओर से पांच हजार से सात हजार करोड़ से ज्यादा खर्च करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। बाकी पैसा विभिन्न प्रायोजकों से जुटाया जाएगा। भारत जैसे राष्ट्र के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च किए जाने को सही तो नहीं ही ठहराया जा सकता है।

दिल्ली में मेट्रो परिवहन का काम 2010 के पहले पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। परन्तु नित नई उलझनों से जूझ रहे मेट्रो रेल कारपोरेशन के पसीने छुट रहे हैं। मेट्रो फेज-1 के तहत 65 किलोमीटर लंबी लाईन बिछाई गई। इसका निर्माण वर्ष 1998 था। परन्तु यह आज भी बाराखंभा और इन्द्रप्रस्थ के बीच ही अटक कर रह गई है। दूसरे चरण में विश्वविद्यालय से जहांगीरपुरी, केन्द्रीय सचिवालय से अंधेरिया मोड़, शाहदरा से दिलशाद गार्डन, इन्द्रप्रस्थ से न्यू अशोक नगर होते हुए नोएडा, यमुना किनारे से आनन्द विहार तथा इंद्रलोक से मुंडका के बीच लाईन बिछाई जानी है। विशेषज्ञों की राय में इतने कम समय में यह काम चुनौतियों भरा प्रतीत होता है।

गरीब विरोधी इस आयोजन के फेर में पहले ही बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हो गए हैं। दिल्ली के झुग्गी और गरीब बस्तियां स्वरोजगार के लिए जानी जाती रही हैं। परन्तु अब इन्हें गंदगी और प्रदूषण फैलाने के नाम पर बन्द कराने का काम किया जा रहा है। ऐसे ही स्वरोजगारों ने बिहार, झारखण्ड से आए हजारों लाखों मजदूरों को दिल्ली में अपना स्थाई ठिकाना बनाने के लिए संबल दिया था। परन्तु उजड़े व्यवसाय के बाद इन्हें अपने नए ठिकानों की तलाश करनी होगी।

राष्ट्रमंडल खेलों के मद्देनजर तैयारियों का ब्योरा

1. 11 फ्लाई ओवर लागत - 285 करोड़ रुपए

2. 200 आधुनिक 800 डीलक्स बसों की खरीद लागत -  240   करोड़ रुपए

3. हेल्थ पर खर्च - 45.70 करोड़ रुपए

4. सड़कों पर लाईट की व्यवस्था लागत- 100  करोड़ रुपए

5. 129.20 कि.मी. सड़क का सौंदर्यीकरण लागत - 68.10 करोड़ रुपए

6. दिल्ली गेट और पंखा रोड पर ग्रेट सेपरेटर लागत - 80    करोड़ रुपए  

संपर्क: 118/7, गौतम नगर, नई दिल्ली-49

 

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन