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परिदृश्य |
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यूपीए सरकार : लडखड़ाते हुए चार साल |
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हिमांशु शेखर |
सर्वहारा समाज के हमदर्द होने का ढोंग रचने वाले वाम
दलों की भूमिका बस झूठा विरोध करने वाली रह गई है। हर बार वे किसी ना
किसी मसले पर बखेड़ा खड़ा करते हैं और प्रधानमंत्री और सुपर प्रधानमंत्री
के संग नाश्ते और खाने की मेज पर बैठते ही उनके सारे रंजो-गम दूर हो
जाते हैं।
जब
2004
में जनादेश राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के
'इंडिया शाइनिंग' और
'फील गुड' के
खिलाफ आया तो केंद्र में राजग के तर्ज
पर ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए की सरकार बनी। उस समय
अचानक उतपन्न हुई परिस्थितियों ने मनमोहन सिंह को सरकार का मुखिया बना
दिया। जब सरकार बनी तब कहा गया कि बेमेल गठबंधन की इस सरकार की मियाद
ज्यादा नहीं है। कमजोर प्रधानमंत्री माने जाने वाले मनमोहन सिंह ने कई
परेशानियों के बीच अपनी सरकार को बचाए रखने में कामयाबी हासिल की।
हालांकि, यह मानने
वालों की भी कमी नहीं है कि इस बेमेल गठबंधन का बिखराव इस लिए नहीं हो
पाया कि इसमें शामिल दलों का मूल मकसद भाजपा को सत्ता से बाहर रखना
रहा।
इस
दौरान जब भी गठबंधन पर आंच आते दिखी तब किसी ना किसी राज्य में चुनाव
हो जाता था। अधिकांश मामलों में केंद्र में सत्तारूढ़ दलों को इन
चुनावों में पटखनी ही मिली। और विपक्ष के पक्ष में बयार बहते दिखी।
इससे उपजी आशंकाओं ने बेमेल गठबंधन को अस्तित्व में बनाए रखा। बीते
22
मई को यूपीए सरकार की उम्र
चार साल हो गई। ऐसे में यह लाजिमी हो जाता है कि इन चार सालों में
सरकार के कामकाज की पड़ताल की जाए।
मौजूदा सरकार अपनी हर सालगिरह पर
रिपोर्ट कार्ड जारी करती रही है। इस साल भी यह रिपोर्ट कार्ड आई। हर
बार की तरह इस मर्तबा भी इसमें सरकार ने जमकर अपने कामकाज का बखान किया
है। इस रिपोर्ट कार्ड में उपलब्धियों की झड़ी लगा दी गई है। पर जमीनी
हकीकत इस गुलाबी सपने से बिल्कुल जुदा है। अभी जिस हालत से लोगों को
रूबरू होना पड़ रहा है उसे सुखद कहने की जहमत कोई नहीं उठा सकता है।
महंगाई की मार से आम लोग बेहाल हैं।
खाद्यान्न संकट की आंच से अनाज उत्पादन
में आगे रहने वाला हिन्दुस्तान भी नहीं बच पाया है। महंगाई के मसले पर
यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सरकार शुरूआत से ही इस पर लगाम कसने में
नाकाम रही है। मनमोहन सिंह को बहुत बड़ा अर्थशास्त्री माना जाता है
लेकिन महंगाई के मामले में उनका गणित ऐसा उलझा हुआ दिखाई दे रहा है जो
सुलझने का नाम ही नहीं लेता। मुद्रास्फीति की दर आठ प्रतिशत हो चली है।
इसकी उड़ान रोकने के सारे सरकारी उपाय असपफल ही साबित हुए हैं।
महंगाई ने सरकार के नीति निर्धारकों के
नाक में भी दम कर रखा है। क्योंकि अब आम मतदाताओं का सामना करने के लिए
एक साल से भी कम का वक्त बचा है। आठ से नौ फीसदी के विकास दर को अपनी
बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करने वाली यह सरकार इस बात से बेखबर बने
रहना चाहती है कि इससे गरीबों को कोई लाभ नहीं हो पा रहा है। बार-बार
वित्त मंत्री शेयर बाजार के सेंसेक्स का हवाला देकर अर्थव्यस्था में
मजबूती का थोथा राग अलापते रहे हैं।
सरकार की पूंजीपरस्त नीतियों की वजह से
आर्थिक गैरबराबरी की खाई दिनोंदिन चौड़ी होती जा रही है। पर इस सरकार ने
जैसे उद्योगपतियों को ही लाभ पहुंचाने वाली हर नीति को अमली रूप देने
को ही अपनी सबसे बड़ी कामयाबी मान ली है। सर्वहारा समाज के हमदर्द होने
का ढोंग रचने वाले वाम दलों की भूमिका बस झूठा विरोध करने वाली रह गई
है। हर बार वे किसी ना किसी मसले पर बखेड़ा खड़ा करते हैं और
प्रधानमंत्री और सुपर प्रधानमंत्री के संग नाश्ते और खाने की मेज पर
बैठते ही उनके सारे रंजो-गम दूर हो जाते हैं। वैसे भी अपनी नीतियों की
अनदेखी करते हुए सत्ता सुख भोगते रहने वाली मानसिकता यहां की राजनीति
में बुरी तरह घर कर गई है।
अमेरिका के साथ होने वाले परमाणु करार पर वाम दलों का विरोध अभी तक
असली होने का अहसास दिला रहा है। तब ही इस करार पर वाम दलों के साथ
सरकार की रार पर लगाम लगते नहीं दिख रही है। हालांकि,
इस नाजुक मसले पर पहले भी कुछ ऐसे मौके आए कि लगा,
अब तो सरकार गई। पर दोनों
पक्षों ने समय के हिसाब से अपना रंग बदला और यह सरकार रेंगती रही। इसके
अलावा भी कई मसले ऐसे हैं जिन पर यूपीए के घटक दल आपस में एकमत नहीं
हैं। पर सत्ता से वंचित होने के बजाए इन विरोधों को दफना देना घटक दलों
के लिए ज्यादा सुविधाजनक हो गया है।
मौजूदा सरकार के गठन पर सहमति न्यूनतम
साझा कार्यक्रम के आधार पर बनी थी। पर इसमें उल्लेख किए गए कई कार्य
पूरे नहीं हो पाए। इस सरकार की उपलब्धियों की जब बखान की जाती है तो दो
बातों का खास तौर पर उल्लेख किया जाता है। पहला रोजगार गारंटी कानून का
और दूसरा सूचना के अधिकार का। इसमें किसी को संदेह होना भी नहीं चाहिए
कि ये दोनों कानून क्रांतिकारी हैं और इनकी बदौलत देश के कई क्षेत्रें
की तस्वीर बदल सकती है। पर एक बड़ा सत्य यह भी है कि केवल कानून बना
देने से कुछ नहीं होता है बल्कि उसका लाभ तो कार्यान्वयन से ही मिलता
है। यूपीए सरकार की बड़ी कामयाबी बताई जाने वाली इन दोनों कानूनों के
अमलीकरण में सरकारी मशीनरी पूरी तरह नाकाम रही है। इन दोनों कानूनों से
जुड़ी कई नकारात्मक खबरें आने के बावजूद केंद्र सरकार ने इनके सफल
कार्यान्वयन की दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठाया। इस योजना के तहत
जारी की जाने वाली भारी-भरकम रकम जरूरतमंदों के पास पहुंचने के बजाए
भ्रष्टाचार के भंवर में ही फंसी रह जा रही है।
खेती-किसानी की हालत इस सरकार के कार्यकाल में सुधरने के बजाए बदतर ही
होती गई। किसानों की आत्महत्या थम ही नहीं पा रही है। इस साल के बजट
में मनमोहन सरकार ने किसानों का मन मोहने के लिए जरूर कर्ज माफी का
शिगूफा छोड़ा है। पर पात्रता के लिए जिस तरह से जोतों का सीमा निर्धारण
सरकार ने किया है,
उससे साफ है कि सरकार का मंसूबा किसानों का भला
करने का नहीं बल्कि लोगों को भ्रम में डालने का है। दरअसल,
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सुपर प्रधानमंत्री
सोनिया गांधी समेत सत्ता में शीर्ष पर विराजमान धुरंधरों को यह डर
हमेशा सताता रहता है कि वामपंथी दल कभी भी सरकार का काम तमाम कर सकते
हैं और चुनाव मैदान में जोर आजमाना पड़ सकता है। इसलिए मनमोहन सरकार ने
गांवों में रह रहे 73
करोड़ लोगों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए किसानों को
कर्ज मापफी का झुनझुना थमा दिया। ताकि लोगों को लगे कि यह सरकार तो आम
लोगों की हमदर्द है।
शिक्षा
के मामले में भी यह सरकार नाकाम ही रही है। कहने के लिए तो हर साल बजट
में तालिम के नाम पर अरबों रुपए का प्रावधान किया जाता है लेकिन आज भी
शिक्षा की रोशनी से देश का एक बड़ा तबका महरूम है। यूपीए सरकार ने अपने
कार्यकाल में पाठयपुस्तकों के जरिए भी जमकर खिलवाड़ किया। तथ्यों को
अपने राजनैतिक एजंडे के हिसाब से प्रस्तुत करने के मामले में तो शायद
ही किसी सरकार ने इतनी बेहयाई दिखाई होगी। हिन्दू देवी-देवताओं के
अपमान करने वाले और हिन्दूओं के भावनाओं को चोट पहुंचाने वाले कई बातों
को स्कूल-कालेज की किताबों में शामिल करके यह सरकार धर्मनिरपेक्ष बनने
का ढोंग
करती रही। पर यूपीए की छद्म धर्मनिरपेक्षता से पूरा देश एम.एफ. हुसैन
और तसलीमा नसरीन के मामले में अच्छी तरह वाकिफ हो गया।
आरक्षण
के मसले पर भी सरकार की सियासत साफ दिखती है। राजनीति में अपनी उपेक्षा
से आहत अर्जुन सिंह ने मानव संसाधन विकास मंत्रलय की बागडोर संभालते ही
आरक्षण का राग अलापना शुरू कर दिया था। अर्जुन सिंह को यह बात हर वक्त
सताती रही कि गांधी परिवार के पुराने भरोसेमंद होने के बावजूद
प्रधानमंत्री की कुर्सी मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी ने सौंप दिया। खैर,
सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी
की तरह अर्जुन सिंह सरकार के चार साल के सफर के दौरान चर्चा में बने
रहे। आरक्षण की सियासत पर आखिरकार सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद लगाम
लगी।
इस
सरकार की किलता मुंबई में भी दिखी। वहां राज ठाकरे देशतोड़क बयान देते
रहे और सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठे रही। महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की
ही सरकार है इसलिए दिल्ली में बैठे सियासतदानों के पास यह कहने का मौका
नहीं रहा कि सूबे की सरकार कुछ नहीं कर रही है। हां,
गाहे-बगाहे सत्ता सुख भोग रहे नेताओं ने 'उचित
कार्रवाई' का आश्वासन
जरूर दिया। पर राज ठाकरे के बेलगाम जबान आग उगलती रही और वहां उत्तर
भारतीय हिंसा झेलने को अभिशप्त हैं। असम में भी ऐसा ही हुआ। अब राज
ठाकरे ने महाराष्ट्र में रह कर पढ़ाई कर रहे उत्तर भारतीयों को निशाना
बनाना शुरू किया है। पर केंद्र और राज्य सरकार नफरत के इस सौदागर के
खिलाफ कोई भी कदम उठाने की साहस नहीं जुटा पा रही है। इस सरकार के शासन
काल में नपफरत की लपट इतनी फैल चुकी है कि अपने ही देश में लोग खुद को
बेगाना समझ रहे हैं।
नंदीग्राम और सिंगुर के मसले पर भी सरकार की खामोशी से कुछ गंभीर संकेत
उभर कर सामने आ रहे हैं। नंदीग्राम में जिस तरह से किसानों की हत्या की
गई और महिलाओं के साथ कुकर्म किया गया,
उससे पूरा देश वाकिफ है। इसके बावजूद वाम दलों के
समर्थन से सांस ले रही सरकार उनके दुष्कर्मों के खिलाफ बोलने का साहस
नहीं बटोर पाई। यानी मतलब साफ है कि सत्ता में बने रहने के लिए यूपीए
को कितना भी पतित होना पड़े,
उसे कोई एतराज नहीं है। शायद अब अपने देश के कर्णधारों
ने मिल-बांट कर सत्ता भोगने का एक सर्वमान्य फार्मूला अपना लिया है।
इनके लिए देशहित और जनहित सिर्फ चुनावी जुमले बन कर रह गए हैं।
राजभवनों के दुरुपयोग के मामले में तो
यह सरकार सभी हदों को पार कर गई। सत्ता में आते ही यूपीए सरकार ने उन
सभी राज्यपालों को राजभवन से बेदखल कर दिया जो उसकी हर सही-गलत फरमान
को अमली रूप देने के लिए तैयार नहीं थे। जिन राज्यपालों ने कादारी का
आश्वासन दिया वे राजभवन का सुख भोगते रहे। बिहार की विधानसभा को भंग
कराने के लिए लालू यादव ने केंद्र सरकार को बाध्य कर दिया था और वहां
के राज्यपाल सरदार बूटा सिंह का ईमान असंवैधानिक कार्य को अंजाम देने
में भी नहीं डिगा। बाद में इसके लिए सरकार को अदालत की फटकार भी सुननी
पड़ी और बिहार की जनता ने भी विधानसभा चुनाव में इसके खिलापफ निर्णय
दिया। झारखंड और गोवा में भी यूपीए ने राज्यपालों के जरिए सत्ता
हथियाने की शर्मनाक कोशिशों को अंजाम दिया।
विदेश
नीति के मोर्चे पर भी इस सरकार के प्रदर्शन को सही नहीं कहा जा सकता
है। पाकिस्तान को लेकर यह सरकार क्या करेगी यह पता कभी लग ही नहीं
पाया। नेपाल के मसले पर भारत सरकार जिस तरह चुप रही उससे इस सरकार की
लचरता और कमजोरी का अहसास होता है। ईरान के साथ होने वाला गैस पाईप
लाइन समझौता अभी भी अधर में अटका हुआ है। ऐसे ही आर्स्टेलिया
ने भारत को यूरेनियम की आपूर्ति करने से इनकार कर दिया है। हालांकि,
जानकार इसे परमाणु करार के
मोर्चे पर दबाव बनाने की रणनीति मान कर चल रहे हैं। उधर बांग्लादेश की
ओर से घुसपैठ होने की गति बढ़ती ही जा रही है और अपनी सरकार सब कुछ
जानते हुए भी अनजान बनी हुई है। इसका खामियाजा देश को आतंकवाद के रूप
में भुगतना पड़ रहा है।
इस
सरकार के पास अब महज एक साल का वक्त है। राज्यों के चुनावी नतीजों से
उभरते संकेतों पर निगाह डालें तो ऐसा स्पष्ट तौर पर आभास होता है कि
मौजूदा सरकार के सितारे गर्दिश में हैं। भारतीय जनता पार्टी ने कर्नाटक
में भी विजय पताका लहरा दिया है। चार साल के कार्यकाल के दरम्यान
कांग्रेस के हाथों से उत्तराखंड,
पंजाब, केरल और मेघालय
की सत्ता सरक चुकी है। साथ ही उत्तर प्रदेश,
बिहार, गुजरात और पश्चिम बंगाल के चुनावी
मैदान में भी कांग्रेस की हालत खस्ता ही रही है। ऐसे में यह देखना बेहद
रोचक होगा कि मनमोहन सरकार बचे एक साल में जनमत को अपने माफिक बनाने के
लिए क्या करेगी?
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shekhar.du@gmail.com |