संप्रग
शासन काल में देश धीरे-धीरे
खाद्य असुरक्षा के युग में प्रवेश कर रहा है। रोजमर्रा
इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं व खाद्यान्नों की तेजी से बढ़ती कीमतों
से यह जगजाहिर हो चुका है कि इस ओर आवश्यक ध्यान नहीं दिया गया। घोर
कुप्रबंधन के वजह से कमर तोड़ महंगाई की मार आम आदमी झेलने को मजबूर है।
पर सरकार अभी तक इस मामले में लापरवाह ही दिख रही है।
कुप्रबंधन की वजह से ही अनाज के इस संकट का सामना हमें करना पड़ रहा है।
ऐसे में देश के लोग यह जानना चाहते हैं कि इतना बड़ा कुप्रंबंधन कैसे
हुआ?
जबकि वर्तमान केन्द्र सरकार के शीर्ष पदों पर
अर्थशास्त्र के ज्ञाता विराजमान हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक
राजनेता के बजाए एक अर्थशास्त्री के रूप में ज्यादा पहचाने जाते हैं।
वहीं वित्त मंत्री पी. चिदंबरम भी अर्थजगत के विशेषज्ञ माने जाते हैं।
यही बात योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह
अहलूवालिया के बारे में भी कही जा सकती है। आर्थिक मामले के इन
जानकारों के नीति निर्धारक होते हुए भी हकीकत तो यही है कि पिछले चार
सालों से महंगाई का बढ़ना बदस्तूर जारी है। और अब अनाज का संकट पैदा हो
गया है।
आज
समूचा राष्ट्र यह जानना चाहता है कि जब राजग के शासन काल में खाद्य
पदार्थों की पर्याप्त उपलब्धता थी तो संप्रग के शासन काल में अनाज का
संकट कैसे पैदा हो गया। यहां यह बताना जरूरी है कि
2000-2003
के दौरान खाद्यान्नों का बफर स्टाक शीर्ष पर था।
इसी का नतीजा था कि 2003 मे ं7000
करोड़ रुपए के खाद्यान्नों का निर्यात भी किया गया
था। उस वक्त को याद करें तो देश में खाद्यान्न भारी मात्र में मौजूद
होने के साथ-साथ उचित मूल्य पर मिलते भी थे। मगर आज परिस्थितियां एकदम
विपरीत है। इस साल के बजट को कांग्रेस ने 'जनता
का बजट' कहा है। इसके
बावजूद खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी ईजाफा हुआ है। यूपीए पूरी
तरह किसानों की अनदेखी कर रही है। अपने देश में विदेशों से ऊंचे दामों
पर घटिया किस्म के गेहूं को मंगवाया गया। वहीं देश के मेहनती गरीब
किसानों को खरीद के दौरान कम कीमतें दी गईं। घटती उत्पादकता और बढ़ती
मांग के साथ-साथ नीतिगत पहल का अभाव समस्या को बढ़ाती जा रही है।
दिशाहीनता से दिन-प्रतिदिन संकट गहराता जा रहा है। खाद्यान्न संकट एक
राष्ट्रीय समस्या है जिसके लिए एक संपूर्ण व व्यवस्थित समाधान की
आवश्यकता है। हर मुद्दा एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। चाहे गिरती हुई
उत्पादकता हो या न्यूनतम समर्थन मूल्य कम होना हो। कर्ज के कारण
किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या तथा जरूरतों के मुताबिक कृषि के
विकास के लिए उचित पहल नहीं होने के तार भी इस समस्या से कहीं ना कहीं
जुड़े हुए हैं। इधर भारत की अर्थव्यवस्था अब एक ऐसे मुकाम पर आकर स्थिर
हुई है जिससे यूपीए सरकार व उसके सहयोगी दलों के होश उड़े हुए है। खुद
प्रधानमंत्री और उनके वित्तमंत्री कभी महंगाई को अर्थव्यवस्था में
मजबूती का स्वभाविक परिणाम बताते हैं तो कभी अंतरराष्ट्रीय मंदी का
नतीजा। अब प्रश्न यह उठता है कि किसी भी देश के लिए अर्थव्यवस्था की उस
मजबूती के क्या मायने जब आम आदमी को दो वक्त की रोटी भी नसीब न हो सके।
(श्री
प्रसाद भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता और राज्य सभा सांसद हैं।)
प्रस्तुति: राजीव कुमार