|
आवरण कथा |
|
इस भोजन संकट के मूल में है अमेरिका |
|
संजय तिवारी |
गांव के गरीब शहर को अमीर बना रहे हैं और शहर के अमीर
अमेरिका जैसे पूंजीपतियों की नैया पार लगा रहे हैं। इसलिए बुश ने अपने
बयान के जरिए इस सोख्ता समाज को अपने साथ मिलाकर रखने की कोशिश की है।
अमीर तबका गरीबों के पेट पर लात मारकर अपने पेट को साल- दर-साल और मोटा
कर रहा है।
इस तरह बहस भुखमरी से
उठकर पेटूपने पर चली गई। अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट से जो सन्न
करता शोर निकला था
वह अमेरिकी राष्ट्रपति की बाजारवादी प्रशंसा में दब गया। अर्जुन
सेनगुप्ता की रिपोर्ट कहती है कि देश के
77
करोड़ लोगों की आमदनी 20
रुपये से भी कम है। उस पर जैसी
चर्चा देश में होनी चाहिए थी वह नहीं हुई। बहस इस बात पर शुरू हो गई कि
भारतीय पेटू इतना खा रहे हैं कि दुनिया में भोजन संकट आ रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति को बयान देना पड़ा कि भारतीय लोगों के खाने से
अमेरिका में कीमतें बढ़ रही हैं। अब अमेरिका के पेटू और भुक्खड़ भारतीय
पेटुओं और भुक्खड़ों को ताना-उलाहना दे रहे हैं। भारतीय पेटू और भुक्खड़
पलटकर अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं। बहस बदल गयी है। शब्दों और
आंकड़ों का युध्द जारी है।
लेकिन
जैसा कि अमेरिकी प्रशासन का मकसद रहा होगा बहस उसी दिशा में है। इस बहस
से मूल बातें और मुद्दे गायब हैं। हौले-हौले अमेरिकी फोटोकापी बनते
भारतीय मध्यवर्ग के लिए यह भी फायदे का सौदा है कि अमेरिका उन्हें अपने
साथ जोड़कर देखे। अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान ने किया भी यही है। सांप
निकल चुका है। उसका काम हो गया। अब हम तो सिर्फ लाठी पीट रहे हैं। देश
के 35
करोड़ मध्यवर्ग की आमदनी अच्छी है। वह केवल भरपेट खा
ही नहीं सकता बल्कि जितना खा सकता है उससे ज्यादा जूठन फेंक सकता है।
और वह यही कर रहा है। बुश ने जो तीर चलाया था वह सही निशाने पर लगा है।
लेकिन थोड़ा करेक्शन करने की जरूरत है। यह 35
करोड़ मध्यवर्ग अमेरिका का हक नहीं छीन रहा है। यह अपने ही वतन के लोगों
के पेट पर लात मारकर अपना खाना बीन रहा है और जितना खा रहा है उससे
ज्यादा छींट रहा है। नई आर्थिक नीतियों के परनाले से जो प्रवाह फूटा है
वह गरीबों के हिस्से की जमा-पूंजी अमीरों की झोली में डाल रहा है।
उद्योग-धंधों से लेकर सेवा-चकारी तक सबका केन्द्रीयकरण हो रहा है। लोग
खेती-बाड़ी से तेजी से उजड़ रहे हैं। नेशनल सैंपल सर्वे बताता है कि आठ
साल पहले हजार आदमी में से 763 लोग खेती
करते थे, यह हमारी आधुनिक नीतियों का परिणाम
है कि अब हजार में से 586
लोग खेती-बाड़ी का काम कर रहे हैं।
इस
उजाड़ के पीछे बड़ा कारण है उद्योगों की नई अवधारणा। ऊपर के लोगों ने
नीचे के लोगों को बाजार बना लिया है। और बाजार की यह मानसिकता एक
सोख्ते के समान है जो नीचे की समृध्दि सोखकर ऊपर निचोड़ आती है। गांव के
गरीब शहर को अमीर बना रहे हैं और शहर के अमीर अमेरिका जैसे पूंजीपतियों
की नैया पार लगा रहे हैं। इसलिए बुश ने अपने बयान के जरिए इस सोख्ता
समाज को अपने साथ मिलाकर रखने की कोशिश की है। अमीर तबका गरीबों के पेट
पर लात मारकर अपने पेट को साल-दर-साल और मोटा कर रहा है। पहले बात
अमेरिका की ही करते हैं कि बुश अपने खाने को अच्छा कह रहे हैं तो उसकी
हकीकत क्या है?
क्या अमरीकी अनाज सचमुच खाने लायक होता है?
औसत
अमेरिकन यही समझता है कि दुनिया वही है जो अमेरिका से जुड़ा हुआ है।
उनके खान-पान में भी यह बात लागू होती है। आज अमेरिका की सबसे बड़ी
समस्या है मोटापा। हर तीसरा अमेरिकी मोटापे का शिकार है। अमेरिका की
61
प्रतिशत आबादी का वजन सामान्य से ज्यादा है। एक
अमेरिकी वेबसाईट मेडिसीन डाट नेट बताती है कि इसके कारण हर तीसरा
अमेरिकी इन्सुलिन डिसबैलेन्श से उपजे डाइबिटीज,
हाई ब्लडप्रेशर, हाई
कोलेस्ट्रोल, ब्रेन स्ट्रोक,
हार्ट अटैक, कन्जेसिव
हार्ट फेलुअर, कैंसर,
आर्थराईटिस और अनिद्रा की गिरफ्त
में है। गलत फूड हैबिट के कारण केवल शारीरिक रोग ही नहीं पनप रहा है
बल्कि शरीर के रोग से लड़ते हुए औसत अमेरिकी तनाव में जी रहा है। अवसाद
भी अमेरिका की गंभीर समस्या बन गया है।
अमेरिका वाले ऐसा क्या खाते हैं कि वे अच्छे भले इंसान से जीते-जागते
जानवर में तब्दील हो गए हैं।
2004
में ब्राउनेल की किताब फूड फाईट आई थी। जिसमें
अमेरिकी फूड हैबिट का अच्छा विश्लेषण किया गया है। ब्राउनेल लिखते हैं,
'अमेरिका के टेलीविजन चैनलों पर आनेवाले विज्ञापनों
ने बच्चों के खाने पर बुरा असर डाला है। कुछ स्कूलों में चैनल वन नाम
का एक कार्यक्रम दिखाया जाता है। कार्यक्रम में दस मिनट का समाचार और
जानकारी दिखाई जाती है और दो मिनट का ऐसा विज्ञापन दिखाया जाता है जो
खाने के बारे में होता है। इनमें अधिकांश विज्ञापन जंक फूड,
बर्गर, सोडा का होता है।
जो स्कूल चैनल वन के इस कार्यक्रम को अपने यहां दिखाने की इजाजत देते
हैं बदले में उन्हें 25000 डालर का वीडियो
उपकरण दिया जाता है। अमेरिका के बारह हजार स्कूलों में इस चैनल वन का
प्रसारण होता है जिसे चार लाख शिक्षक और 80
लाख छात्र नियमित तौर पर देखते हैं। इस चैनल पर तीस सेकेण्ड का
विज्ञापन देने के लिए 1,75,000 डालर देना
पड़ता है। विज्ञापन की यह ऊंची दर इसलिए है,
क्योंकि समझा जाता है कि अमेरिका के 40
प्रतिशत किशोर और नौजवान इस चैनल को नियमित देखते हैं। इस चैनल के
प्रभाव से उबरने के लिए वहां कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। यूएस
डिपार्टमेंट आफ एग्रीकलचर ने कार्यक्रम चलाया है जिसे कहा जाता है
स्कूल में स्वस्थ भोजन। क्योंकि अमेरिका के 76
प्रतिशत स्कूल पिज्जा और बर्गर जैसे
जंकफूड बेचते हैं।
अमेरिकियों में खाने की ललक बढ़ी है क्योंकि खाने पर कंपनियों का कब्जा
है। कंपनियां अपना फूड प्रोडक्ट बेचने के लिए तरह-तरह के हथकण्डे
अपनाती हैं। इसका असर यह है कि औसत अमेरिकी साल में
1046
किलो अनाज, 78 किलो दूध
और 41 किलो वेजीटेबल आयल का भक्षण कर जाता
है। अगर इसका विश्लेषण करें तो पता चलेगा कि अमेरिकी के खाने में
40 प्रतिशत केक,
पेस्ट्री, कुकीज,
पाईज और ब्रेड होता है, 21 प्रतिशत मांस
होता है, 17 प्रतिशत क्रीम और चीज होती है,
आठ प्रतिशत तला आलू होता है,
पांच प्रतिशत चिप्स और कार्नफ्लेक्स होता है और एक
प्रतिशत सलाद और हरी सब्जियां होती हैं। यह अमेरिका की 'रिच
फूड हैबिट' है। जिसकी दुहाई देते हुए
अमेरिकी राष्ट्रपति दोहरे होते जा रहे हैं। असल में अमेरिका की यही फूड
हैबिट उसके लिए संकट बन गया है। जिसे अब वह दुनिया के दूसरे देशों के
सिर मढ़ना चाहता है। अमेरीकियों का भोजन बढ़ा है। कुछ अध्ययन बताते हैं
कि 1957 में औसत बर्गर का वजन 28
ग्राम होता था जो आपको 210
कैलोरी शक्ति प्रदान करता था। आज औसत बर्गर का वजन
170 ग्राम होता है जो आपको 618
कैलोरी शक्ति प्रदान करता है। ब्राउनेल कहते हैं कि
मैकडोनाल्ड और दूसरे फास्ट फूड सेंटरों द्वारा बेचा जा रहा बर्गर और
प्रफेंच प्रफाईज सबसे खतरनाक जंक फूड हैं। औसतन अमेरिकियों के मोटापे
में इनका योगदान 36 से 47
प्रतिशत बैठता है। अमेरिकी कृषि विभाग द्वारा एक
सर्वे कुछ साल पहले जारी हुआ था जो बताता है कि औसत अमेरिकी 70
के दशक में खाने पर अगर अपनी कमाई का 25
प्रतिशत खर्च करता था तो आज वह अपनी कमाई का
40 प्रतिशत से भी ज्यादा
सिर्फ खाने पर खर्च कर रहा है।
अमेरिका वाले क्या खाते,
क्या नहीं खाते यह हमारे लिए किसी महत्व का नहीं
है। वहां कंपनियों ने ऐसा मकड़जाल फैला रखा जिसने आदमी को मंद और कुंद
कर दिया है। दुर्भाग्य से कंपनियां यही सब अब भारत में करना चाहती हैं
क्योंकि अमेरिका में लगातार फैल रही जागरूकता से ऐसे फूड हैबिट को
बदलने पर जोर दिया जा रहा है। जार्ज बुश जिस भोजन का महिमामंडन कर रहे
हैं वह घटिया और दोयम दर्जे का है। खुद जागरूक अमेरिकन इसे पुअर फूड
हैबिट कहता है। 'फास्ट फूड नेशन'
के लेखक एरिक स्लोशर लिखते हैं, 'फास्ट
फूड ने देश का अपहरण कर लिया है।' कंपनियों
के प्रभुत्व वाला यह फास्ट फूड अपहरण उद्योग 120
बिलियन डालर के पार है। जहां इतना बड़ा व्यवसाय खड़ा
हो गया हो वहां आदमी के स्वास्थ्य की चिंता कौन करता है। सुन रहे हैं न
बुश साहब। अपना भाषण देना बंद करके क्या आप अमेरिकी नागरिकों से कहेंगे
कि भारत के संपन्न और स्वास्थ्यकारी भोजन परंपरा से कुछ सीखने की कोशिश
करो?
यह सब
होते हुए भी अमेरिका लंबी रणनीति के तहत अपने राष्ट्रपति से इस तरह का
बयान दिलवा रहा है। इस रणनीति के कई पहलू हैं। पहला,
यह स्थापित करना जरूरी है अमेरिका से जो अनाज भारत
में निर्यात किया जा रहा है वह बहुत अच्छी किस्म का है। हकीकत इसके उलट
है। अमेरिकी अनाज घटिया दर्जे का होता है और खुद अमेरिका में भी
अमेरिकी अनाज दोयम दर्जे का ही समझा जाता है। अमेरिका में हर चौथा आदमी
आर्गेनिक फूड खरीदने लगा है। अमेरिका में आज ऐसे 20
लाख फार्म हैं जो आर्गेनिक खेती करते हैं। अनुमान
है कि आज अकेले अमेरिका में 20 अरब डालर का
आर्गेनिक खाद्य बाजार है। ऐसे में अरबों डालर के निवेश से खड़ा किया गया
जेनेटिकल फूड प्रोडक्शन टेक्नालाजी के नाकाम होने का खतरा है। इस तकनीक
पर लगे पैसे की भारपाई के लिए जरूरी है कि दुनिया के दूसरे 'गरीब'
देशों को फंदे में लिया जाए।
इस तरह की बयानबाजी का सबसे पहला मकसद यह साबित करना है कि जेनेटिकली
मोडिफाईड खाद्य पदार्थ सुरक्षित है। बुश के इस बयान के बाद बहस का
मुद्दा यह हो जाएगा कि आप कैसे कह सकते हैं कि भारत के लोगों को कम
खाना चाहिए। बुश और अमरीकी प्रशासन चाहता भी यही है कि बहस ऐसी हो
जिसकी प्रतिक्रिया में अमरीकी माल ज्यादा मात्र में भारतीय बाजारों में
बिके और जीई/जीएम फूड पर सवाल न उठाया जा सके। एक ओर खुद अमेरिका
आर्गेनिक फार्मिंग के नाम पर परंपरागत खेती की ओर जा रहा है तो दूसरी
ओर भारत जैसे देशों में वह परंपरागत खेती को नष्ट करके जहरीले रसायनों
वाले खाद्यान्न को बढ़ावा देने में लगा हुआ है।
इस तरह
के बयान का दूसरा मकसद है भविष्य के कार्बन ट्रेड को संतुलित करना।
वर्तमान में भारत कार्बन उत्सर्जन में बाजी मारे बैठा है। अमेरिका में
प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन
23
टन है तो भारत में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन
1.67 टन है। अगर अमेरिका को अपनी शानोशौकत
को बनाए रखना है तो जरूरी है कि वह दुनिया के विकास को अपने हिसाब से
निर्धारित करे। मसलन दुनिया के किस हिस्से में जंगल लगना चाहिए और किस
हिस्से में उद्योग यह अमेरिका तय करेगा। इससे फायदा यह है कि दुनिया के
अधिकांश देश अमेरिका के तय मानकों के अनुसार उत्पादन करेंगे और बदले
में विश्व बैंक द्वारा घोषित कार्बन फण्ड से खाना खरीदकर खाएंगे। हो
सकता है कल को विश्व बैंक कोई योजना ला दे कि भारत में पेड़ लगानेवाले
को एक हजार रुपया मिलेगा। अब आप बैठकर पेड़ लगाईए,
फूलों की खेती करिए और कार्बन
क्रेडिट की कमाई से जो पैसा मिलता है उससे अपने और अपने परिवार का भरण
पोषण करिए।
तीसरा
मकसद है भारत के
35 करोड़ मध्यवर्ग को अपने साथ
मिलाकर रखना। अमेरिकी राष्ट्रपति ने जानबूझ कर 35
करोड़ मध्यवर्ग का जिक्र किया है। यह 35
करोड़ मध्यवर्ग भारत की सबसे बड़ी समस्या है। आज
उदारीकरण का जितना कोढ़ फैल रहा है उसके मूल में इसी 35
करोड़ मध्यवर्ग की लालच है। अमरीकी कंपनियां लंबे
समय से इस रणनीति पर काम कर रही हैं कि इस 35
करोड़ मध्यवर्ग को अमरीकी सोच-समझवाला कैसे बनाया
जाए। बुश के इस तरह के बयान से यह 35 करोड़
मध्यवर्ग और उत्साहित होगा कि उसका विकास होगा और उसकी खर्च करने और
विदेशी माल और भोजन के प्रति लगाव बढ़ेगा। अमेरिका चाहता भी यही है।
35 करोड़ को पटाने के लिए इससे अच्छा कुछ हो
नहीं सकता कि आप उन्हें कहें आप विकास कर रहे हैं और विकास के नाम पर
इतना पागल कर दें कि उनकी खरीदने की ललक बढ़ती चली जाए। इसी महीने एक
रिपोर्ट जारी हुई है जो बताती है अमेरिकी नीतियां कामयाब हो रही हैं और
मध्यवर्गीय भारतीय खाने और किराना के सामान पर अपनी कमाई का ग्यारह
प्रतिशत हिस्सा खर्च करता है। 2011 तक यह
खर्च बढ़कर 23 प्रतिशत
हो जाएगा। कहने की जरूरत नहीं कि यह सारी बढ़ोत्तरी पैकेज्ड फूड की
होगी।
इसलिए
जयराम रमेश जैसे लोग बुश के बयान की निंदा करके सिर्फ फौरी तौर पर अपनी
जान छुड़ा रहे हैं। दबे अर्थों में तो वे बुश का समर्थन ही कर रहे हैं।
जितना इस तरह का पैकेज्ड फूड वाला विकास बढ़ेगा उतनी अमेरिका और अमेरिकी
प्रशासन और कंपनियों को व्यापार करने का मौका मिलेगा। खाने और खर्च
करनेवाला बुश का यह बयान भारत की निंदा नहीं बल्कि अमेरिका के लिए
संभावित बाजार को तैयार करने के लिए दिया गया है। अब हम इसमें उलझ जाएं
यही तो अमेरिकी रणनीतिकार चाहते हैं। यह कहना कि भारतीयों ने अच्छा
खाना शुरू कर दिया है,
भारतीयों को मनोवैज्ञानिक
रूप से दबाव में डालता है कि पहले वे अच्छा नहीं खाते थे। जबकि हकीकत
यह नहीं है।
इस
संकट के मूल में अमेरिका खुद है। इसके मूल में तीन कारण हैं। पहला
अमेरिका में बेतहाशा जैव ईंधन ई-85
को बढ़ावा दिया जा रहा है और दूसरा भोजन पर उसकी
पैकेजिंग, परिवहन और रखरखाव का खर्चा बहुत
बढ़ गया है। तीसरा अमेरिका द्वारा अपने किसानों को दी जा रही सब्सिडी।
अमेरिकन कोएलिशन फार एथनाल की रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका में अन्न की
कीमत में उत्पादन पर आई लागत सिर्फ 20
प्रतिशत होती है। बाकी 80 प्रतिशत खर्च उसके
प्रोसेसिंग, पैकेजिंग,
श्रम और परिवहन पर होता है। इसका नतीजा यह है कि
अमेरिका में खाद्यान्न कीमतों में पिछले साल चार प्रतिशत की बढ़ोत्तरी
हुई। यूएसडीए की रिपोर्ट कहती है कि मान लीजिए एक किलो अनाज की कीमत एक
डालर है तो उसपर खेती की लागत 19.5 प्रतिशत
है, श्रमिकों पर खर्च 38.5
प्रतिशत है, परिवहन पर
चार प्रतिशत, उर्जा पर 3.5
प्रतिशत, पैकेजिंग पर आठ
प्रतिशत, विज्ञापन पर चार प्रतिशत,
गोदाम पर 4.5 प्रतिशत,
टैक्स पर 3.5 प्रतिशत,
सूद पर 2.5 प्रतिशत और
लाभ कमाई 4.5 प्रतिशत होता है। बाकी अन्य
खर्चे हैं। साफ है कि अमरीकी माडल अन्न से ज्यादा अन्न के व्यापार पर
खर्च करता है। अप्रैल 2008 में जारी फेडरल
बैंक आफ कन्सासस की रिपोर्ट बताती है कि अनाज पर बाजार का प्रभुत्व
बढ़ती कीमतों के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। साठ के दशक में खेत में
पैदा होनेवाले अनाज और उपभोक्ता तक उसकी पहुंच में 59
प्रतिशत का अंतर होता था जो आज बढ़कर 80
प्रतिशत हो गया है।
अमेरिकी खाद्य व्यापार करने वाली कंपनियां मैकडोनाल्ड,
बर्गर किंग्स दुनिया के जिस
हिस्से में जा रही हैं वहां के न केवल भोजन व्यवहार को बदल रही हैं
बल्कि अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए किसानों के खेती के पैटर्न को
भी बदल रही हैं। ऐसे में किसान अपनी परंपरागत खेती से मुंह मोड़ता है और
नकदी फसल की ओर रूख करता है। जिससे खाद्यान्न का संकट खड़ा होना लाजिमी
है।
दूसरा
बड़ा कारण है अमेरिकी सरकार और रणनीतिकारों द्वारा एथनाल आयल के प्रयोग
को बढ़ावा देना। तेल की बढ़ती कीमतों से निपटने के लिए अमेरिका एथनाल
मिश्रित पेट्रोल और डीजल के प्रयोग को बढ़ावा दे रहा है। अमेरिका में इस
समय
50 लाख गाड़ियां एथनाल से चल रही हैं। एथनाल आयल को
अमेरिका में ई-85 के नाम से जाना जाता है।
उसमें 85 प्रतिशत एथनाल होता है और
15 प्रतिशत गैसोलीन। यह गैसोहोल से अलग है जिसमें
मात्र दस प्रतिशत एथनाल मिलाया जाता है और इस ईंधन को प्रयोग करने के
लिए गाड़ियों में कोई बदलाव नहीं करना होता। अमेरिकी प्रशासन का जोर है
कि ई-85 पर जोर बढ़े। लेकिन ई-85
पर जोर देने से परिणाम क्या होंगे। खुद अमेरिकी
प्रशासन यह स्वीकार करता है कि ई-85 जितनी
उर्जा पैदा करता है उससे 26 प्रतिशत ज्यादा
उर्जा उसके निर्माण पर लगती है। फिर भी सन 2025
तक एथनाल के विस्तार पर तेजी से काम करने की योजना
है। इसका कारण यह है कि अमेरिका चाहता है कि 2025
तक अमेरिका की मध्य पूर्व देशों पर तेल की निर्भरता
खत्म हो। वह अपनी तेल निर्भरता को 75
प्रतिशत तक कम करना चाहता है।
साल
2005
में अमेरिका ने 140
बिलियन गैलन गैसोलीन का प्रयोग किया। जिसमें जैव ईंधन की मात्र चार
बिलियन गैलन थी। यानी कुल खपत का मात्र तीन प्रतिशत। अमेरिका चाहता है
कि ई-85 पर पूरी तरह से जाने के लिए
119 बिलियन गैलन जैव ईंधन की जरूरत होगी जिसके लिए
वह अपने खेतों को पर्याप्त नहीं मानता। इसलिए ब्राजील जैसे देशों में
इसके उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। अकेले 2008
में 100 मिलियन टन अनाज
को हम गाड़ियों के पेट में भर कर धुआं कर देंगे। खेत में उगे अनाज को
गाड़ी का ईंधन बनाना कितना भारी पड़ता है यह समझना हो तो यूएन की रिपोर्ट
देखिए जो कहती है कि एथनाल मिश्रित ईंधन से 50
लीटर का एक टैंक भरने में 232
किलो मकई या गन्ने का रस बर्बाद चला
जाता है।
दुनिया में अनाज की बढ़ती कीमतों का एक
और बड़ा कारण है अमेरिकी किसानों को मिलनेवाली सब्सिडी। अपने किसानों को
एक नियमित आय सुनिश्चित कराने के लिए अमेरिका भारी सब्सिडी देता है। इस
सब्सिडी के कारण अमेरिकी कंपनियां और किसान दुनिया के देशों को इतनी कम
कीमत पर अनाज बेचते हैं कि दुनिया के दूसरे देश उस कीमत पर व्यापार
नहीं कर सकते। एथनाल उत्पादन के विस्तार के लिए भी अमेरिका अपने
किसानों को सब्सिडी बांट रहा है। इस सब्सिडी अर्थव्यवस्था का असर यह है
कि संयुक्त राष्ट्र की राईट टू फूड रिपोर्ट ने भी आपत्ति जताते हुए कहा
है कि वर्तमान संकट बताता है कि औद्योगिक खेती के भरोसे भूख से नहीं
लड़ा जा सकता। रिपोर्ट यह भी आरोप लगाती है कि विश्व बैंक और मुद्राकोष
दुनिया की खेती का गलत आकलन कर रहे हैं। इससे संकट कम होने की बजाए आने
वाले दिनों में और बढ़ेगा।
इसलिए
यह कहना कि दुनिया में खाद्यान्न संकट के लिए भारत जैसे देशों में
भरपेट खाना जिम्मेदार है,
सही नहीं है। मूल कारण अमेरिका का उपभोक्तावाद और
उसकी गलत नीतियां हैं। भारत इस समय सलाना 76
मिलियन टन गेहूं और 96 मिलियन टन चावल का
उत्पादन करता है। जबकि खपत 72 मिलियन टन और
91 मिलियन टन है।
यानी भारत अनाज उत्पादन के मामले में सरप्लस है। भारत इतना अनाज
उत्पादन करता है कि वह अपने लोगों को भरपेट खिलाने के साथ ही दुनिया
में भी कुछ देशों का पेट भर सकता है। अमेरिका यह नहीं चाहता।
(लेखक
विस्फोट.काम के मॉडरेटर हैं)
ईमेल:
sanjaytiwari07@gmail.com |