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जून,  2008

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मासूमों की फिक्र

प्रेमा बहन जोशी

उत्तराखंड के मासूमों की हालत सुधारने की दिशा में 'चन्द्रा मातृ एवं बाल कल्याण समिति' के जरिए हम लोगों ने कुछ सकारात्मक करने की ठानी और आगे भी बढ़े।

आजादी के साठ साल गुजरने के बावजूद आज भी हमारे देश में करोड़ों बच्चों को बचपन में ही शिक्षा से वंचित रह कर अपने परिवार के लिए आर्थिक साधन जुटाने के कार्य में संलग्न होना पड़ता है। यह समस्या  दिनोदिन गहराती जा रही है। उत्तराखंड में भी इस समस्या ने बहुत विकराल रूप धारण कर लिया है। यहां भी ऐसे मासूमों की बड़ी संख्या है जो शिक्षा की राह छोड़कर मजदूरी करने को अभिशप्त हैं। 

उत्तराखंड के छोटे-बड़े होटलों में बर्तन साफ करने के कार्य से जुड़े लड़के एवं अपनी मां के साथ मजदूरी करती छोटी-छोटी बालिकाएं हमारे देश के दुर्भाग्यपूर्ण तस्वीर पेश कर रही हैं। उत्तराखंड के मासूमों की हालत सुधारने की दिशा में 'चन्द्रा मातृ एवं बाल कल्याण समिति' के जरिए हम लोगों ने कुछ सकारात्मक करने की ठानी और आगे भी बढ़े। हमने कौसानी के लगभग 40 किलोमीटर की परिधि में इस समस्या से पार पाने के लिए कई कार्य किए। हमने पाया कि जिन बच्चों के पिता की मृत्यु हो गई है, जिनके पिता अपाहिज है, जिनके पिता लापता हैं उन बच्चों को बचपन में शिक्षा से वंचित रह कर कष्ट पूर्ण परिस्थिति से गुजरना पड़ता है। क्योंकि पिता के न होने के कारण शिक्षा सत्र के प्रारम्भ होते ही स्कूल में प्रवेश के समय होने वाले खर्चे की व्यवस्था कर पाना अकेली मां के लिए बहुत कठिन होता है।

गत अनेक वर्षो से चन्द्रा मातृ एवं बाल कल्याण समिति अपने विभिन्न श्रोतों से कौसानी के चारों ओर लगभग 600 बच्चों के लिए इस प्रकार की सुविधा जुटा कर उन्हें शिक्षा के अवसर प्रदान कर रही है। हमें इस बात की खुशी है कि इस अवधि में हमने इन बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया। जिसके फलस्वरुप परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के बावजूद भी ये शिक्षा प्राप्त कर रहे है।

जैसे-जैसे संस्था के कार्यक्षेत्र का विस्तार हो रहा है हमारे सम्पर्क में आने वाले इन बच्चों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। यह जानकारी देते हुए बहुत कष्ट हो रहा है कि आर्थिक साधनों के सीमित होने के के कारण संस्था इन सभी बच्चों को अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता नहीं कर पा रही है। इस विषय पर चिन्तन करने के लिए संस्था ने मार्च 2008 में इन बहनों की आम सभा में तय किया कि इस समस्या के स्थाई समाधान के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। आम सभा में सभी बहनों का मत था कि हमारे बच्चों को अनाथ करने में सरकार की बहुत बड़ी भूमिका है। गत 40 वर्षों में सरकार ने शराब के व्यापार को जिस प्रकार गांव-गांव पहुंचाया है उसी का यह परिणाम हमारे परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। ऐसे भी परिवार हैं जहां पिता की मृत्यु हो जाने के कारण आठ बच्चों की देखभाल अकेली मां को करनी पड़ती है।

शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक बच्चे का अधिकार है। हमारे देश की शासन व्यवस्था, न्याय पालिका एवं संसद सभी इस बात को स्वीकार करते हैं। पर हकीकत यह है कि शिक्षा प्राप्त करने की उम्र में मासूमों को विद्या के मंदिर में पहुंचाने की सारी योजनाएं धरी की धरी रह जा रही हैं। इस ओर शासन का ध्यान आकर्षित करने के लिए बहनों ने मई में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को राज्य के विभिन्न अधिकारियों के माध्यम से प्रार्थना पत्र प्रेषित किया। इस अवसर पर बहनों ने सामूहिक रुप से पदयात्र के साथ ही तहसील एवं जिला कार्यालयों के सामने एवं नगर के मुख्य स्थानों पर सभाओं का भी आयोजन किया। यह संस्था विधवा बहनों की बेहतरी की दिशा में भी प्रयासरत है।

 ईमेल: chndra_pranam@yahoo.com

 

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