|
|
|
कहानी |
|
मुकद्दमे का नतीजा |
|
शरतचन्द्र |
बांस के दो पत्तों के लिए देवर द्वारा किए अपमान को न
पचाती बड़ी बहू भी अपने घर में अनशन किए बैठी थी। उसने भी प्रण ठान लिया
था कि इस झगड़े का अन्तिम फैसला न होने तक वह अन्न-जल ग्रहण नहीं करेगी।
वृध्द
सामन्त वृन्दावन की मृत्यु के उपरान्त उनके दोनों बेटे-शिब्बू और
शम्भू- प्रतिदिन लड़ते रहते रहने पर भी पांच-छह महीनों तक एक साथ पकाते
खाते रहे,
किन्तु निर्वाह न कर पाने के कारण बाद में दोनों
अलग हो गए। स्वयं गांव के जमींदार चौधरी साहब ने संयुक्त संपत्ति,
खेती-बाड़ी,
जमीन-जायदाद और बाग-तालाब आदि का दोनों में विभाजन कर
दिया। इस आधार पर बड़ा भाई पुराने घर में ही रहता रहा और छोटा भाई शम्भू
तालाब के पास मिट्टी का घर बनाकर अपनी पत्नी (छोटी बहू) और बाल-बच्चों
के साथ उसमें रहने लगा।
सारी
संपत्ति का बंटवारा हो गया,
किन्तु बांसों का एक झुरमुट संयुक्त अधिकार में बना
रहा। शिब्बू का तर्क था कि उसे पुराने पड़ गए अपने मकान को नए सिरे से
बनवाना है और इसके लिए उसे बांसों की भारी आवश्यकता पडेग़ी। छप्पर-खूंटी
आदि सभी कामों के लिए बांस चाहिए ही होंगे,
अपना झाड़ न रहा, तो किसके आगे हाथ फैलाऊंगा?
विरोध
करता हुआ शम्भू व्यंग्य की भाषा में बोला,
'क्या, इनकी आवश्यकता ही
वास्तविक आवश्यकता है? क्या मेरी आवश्यकता
का कोई महत्त्व नहीं? क्या मेरा काम केले के
पत्तों से चल जाएगा? मेरा अनुरोध है कि मेरी
आवश्यकता की उपेक्षा करना उचित नहीं।' इस
प्रकार दोनों की आवश्यकता की पूर्ति के इस साधन को दोनों के संयुक्त
अधिकार में रहने दिया गया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि शम्भू द्वारा एक
टहनी को काटने की चेष्टा करने पर शिब्बू गंडासा लेकर उस पर झपटता और
शम्भू यदि शिब्बू की पत्नी को बांस के पास खड़ा भी देख लेता,
तो लाठी लेकर आ जाता। षष्ठी देवी की पूजा-जैसे किसी
धार्मिक अनुष्ठान के अवसर पर बड़ी बहू गंगामण्श्नि को थोड़े-से बांस के
पत्तों की आवश्यकता थी। इस गांव में यह आवश्यकता कहीं से भी पूरी की जा
सकती थी, किन्तु अपने यहां पत्ते सुलभ होने
पर किसी दूसरे के आगे हाथ पसारना उचित नहीं लगता था। इसके अलावा उसने
सोचा था कि उसका देवर अब तक खेत पर चला गया होगा और घर में अकेली रह
गयी छोटी बहू कोई बखेड़ा खड़ा नहीं करेगी। किन्तु न जाने शम्भू किस कारण
उस दिन अभी तक खेत पर न जाकर घर पर ही बैठा था। बासी भात खाकर हाथ-मुंह
धोने जा रहे शम्भू के पास आकर छोटी बहू ने बड़ी बहू द्वारा किए जा रहे
उत्पात की जानकारी दी,
तो क्रोध से तमतमाते शम्भू ने बांस के झुरमुट के पास
पहुंचकर भाभी के हाथ से पत्ते छीन लिए और तोड़-मरोड़कर इधर-उधर फेंक दिए।
इसी के साथ उसने अपनी भाभी को ऐसी खरी-खोटी सुनायी कि बड़ी बहू तिलमिला
उठी। भाभी के प्रति शम्भू का यह व्यवहार निस्सन्देह निन्दनीय था।
क्रोध
से ऊनती बड़ी बहू ने खलिहान से अपने पति को बुलावा भेजा। शिब्बू कुछ
असामान्य घट जाने की आशंका से हल चलाना छोड़कर हाथ में हंसिया लेकर घर आ
पहुंचा। पत्नी के रुदन पर उत्तेजित शिब्बू ने हवा में हंसिया घुमाते
हुए शम्भू को चुनौती के स्वर में भद्दी गालियां दीं,
जिन्हें सुनकर लोग इकट्ठे हो गए। इतने पर भी
सन्तुष्ट न होने पर वह अपनी शिकायत लेकर चौधरी साहब के यहां जा पहुंचा
और उत्तेजित स्वर में बाला, 'यदि आपसे भी
मुझे न्याय नहीं मिलेगा, तो मैं न्यायलय में
शम्भू के विरुध्द मुकद्दमा ठोक दूंगा। ऐसा न करने पर तो मुझे अपने को
मर्द कहलाने पर लज्जा आएगी।' शम्भू अपनी
भाभी के हाथ से पत्ते छीनने के बाद हल चलाने खेत में चला गया था।
स्त्री ने घर में अकेली रह जाने पर रोना,
किन्तु शम्भू ने ध्यान ही नहीं दिया। पति के आने पर शेरनी बनी जेठानी
ने आसमान सिर पर उठाकर सारा मोहल्ला इकट्ठा कर लिया। जेठ ने आकर जो
सुनाया, उसका वर्णन करना भी उचित नहीं लगता।
छोटी बहू ने छोटी होने की लोकमर्यादा का निर्वाह करते हुए चुपचाप सब
कुछ सुन-सह लिया। इससे उसका तन-बदन जलने लगा,
पति पर भी उसका क्रोध अपने चरम उत्कर्ष पर था,
जिसके कारण उसने खाना पकाने
का विचार ही छोड़ दिया। वह उदास भाव से पैर पसार कर लेट गई और सुबकने
लगी।
बांस के दो पत्तों के लिए देवर द्वारा
किए अपमान को न पचाती बड़ी बहू भी अपने घर में अनशन किए बैठी थी। उसने
भी प्रण ठान लिया था कि इस झगड़े का अन्तिम फैसला न होने तक वह अन्न-जल
ग्रहण नहीं करेगी। इसी के साथ उसने स्वामी के घर को छोड़कर मायके चली
जाने की धमकी भी दे डाली थी। डेढ़े पहर दिन चढ़ जाने पर भी शिब्बू के घर
न लौटने पर बड़ी बहू आशंकित हो उठी थी कि चौधरी साहब के व्यवहार से
आश्वस्त न होने पर कहीं उसका पति सीधे कचहरी न चला गया हो।
गयाराम
अभी एक साल का ही हुआ था कि उसकी मां स्वर्ग सिधार गई। शम्भू ने दूसरा
विवाह तो कर लिया,
किन्तु बालक के पालन-पोषण का भार बड़ी बहू ने अपने
ऊपर ले लिया था। दोनों भाइयों के अलग होने तक ताई ने अपनेर् कत्तव्य का
पूरी ईमानदारी से पालन किया। नई बहू के साथ बालक का कोई खास लगाव नहीं
बन पाया। इसलिए दोनों भाइयों के अलग हो जाने पर भी बालक का ताई के घर
आना-जाना पहले जैसा ही बना रहा। आज अपने घर में जाने पर गयाराम ने
चूल्हा ठण्डा देखा, तो वह अत्यन्त क्रुध्द
हो उठा और ताई के घर चला आया फिर ताई के चेहरे को देखकर,
तो बालक के भीतर की ज्वाला और भी अधिक धधकने लगी।
वह बिना कुछ पूछताछ किये बोला, 'ताई,
भूख लगी है, खाने को भात
दो।' ताई ने सुनकर अनसुना कर दिया। वह
पूर्ववत् जड़ बनी चुपचाप बैठी रही। इससे तिलमिलाते हुए गयाराम ने धरती
पर पैर पटककर कहा, 'बोल तो सही,
भात देना है या नहीं?'
गंगामणि भी क्रुध्द स्वर में बोली, 'मैंने
भात कब पकाया है, तुझे दूं?
क्या तेरी सौतेली मां ने तुझे खाने के लिए कुछ भी
नहीं दिया, जो तू इधर भाग आया है।'
गयाराम
भी चिल्लाकर बोला,
'तू उसकी बात छोड़ और हां,
अपनी बात बता कि तू मुझे भात देती है या नहीं?
नहीं देती, तो मैं तेरी
सारी हांडियां और मटकियां अभी तोड़ता- फोड़ता हूं।'
कहता हुआ वह रसोई घर की ओर चल दिया। रसोई का किवाड़
खेलने से पूर्व रुक गया गयाराम कुछ सोचता हुआ शान्त स्वर में बोला,
'तू भात नहीं देती, तो न
दे, कोई बात नहीं। मैं अभी अपनी आंखों से
देख आया हूं कि नदी के किनारे पर स्थित बड़ के पेड़ के नीचे पूजा करी हुई
ब्राह्मणों की लड़कियां मुट्ठी भर-भरकर चिउड़ा-मुड़की जिस किसी को दे रही
हैं। मैं उन्हीं से लेकर अपनी भूख मिटा लूंगा।'
गयाराम की बात सुनते, ही
गंगामण्श्नि को आज अरण्यषष्ठी होने की सुधि हो आयी और फिर अपने क्रोध
पर नियन्त्रण पाकर वह शान्त स्वर में बोली, 'देखती
हूं कि तू खाली पेट इस घर से कैसे जाता है?'
'तुम
देखती रहना,
मैं तो जा रहा हूं।'
कहते हुए गयाराम
ने फटे-अंगोछे को कमर पर लपेटा और बाहर निकल गया। उसे उच्च स्वर में
रोकती और डांटती हुई गंगामणि बोली,
'अभागे,
जानता है कि छठ के
दिन दूसरों से मांगकर खाने से दुर्गति होती है। अपने हित की थोड़ी सी तो
चिन्ता कर ले।'
गयाराम
ने ताई के कथन को अनसुना कर दिया। रसोई में जाकर उसने सरसों को तेल सिर
पर लगाया और बाहर जाने लगा,
तो ताई दौड़कर आंगन में आई और बोली, 'देख,
आज मैं क्रोध में हूं। यदि तू नदी में डुबकी लगाकर
सीधा मेरे पास न आया, तो मैं तेरे साथ नाता
तोड़ दूंगी। आज के दिन किसी का दिया हुआ नहीं खाना चाहिए।'
गयाराम निश्चिन्त प्रकृति का लड़का था। वह ताई को
अंगूठा दिखाकर चलता बना। गंगामणि उसके पीछे-पीछे सड़क पर भागती चली गयी
और उसे सुनाती हुई बोली, 'लल्ला,
आज के दिन कोई भात नहीं खाता। तू जल्दी से नहाकर
लौट आ। मैं तुम्हें केले, सन्देस,
बर्फी और दूध-दही का भोजन कराऊंगी। आज के दिन भीख
मांगकर खाएगा, तो शूद्र कहलाएगा।'
गयाराम थोड़ी दूर जाकर रुका और बोलना, 'झूठी
कहीं की, घर में यह सब कुछ था,
तो फिर खाने को दिया क्यों नहीं?
कुछ नहीं है, कहकर टरका
क्यों दिया?'
गाल पर
हाथ रखकर हैरानी प्रकट करती हुई गंगामणि बोली,
'अरे दुष्ट, मैंने कब
कहा कि घर में खाने को कुछ नहीं। डाकुओं की तरह तुम्हारा घर में घुसना,
बिना नहाये और बिना बातचीत किए खाने पर लपकना,
यह भी कोई तरीका है? तू
पूछता-ताई, आज क्या खाने को देती है,
तो मैं तुम्हें सब बताती। अब बहस मत कर,
जल्दी से नहाकर आ, खाने
को बहुत कुछ मिलेगा, कोई कमी नहीं है।'
गयाराम बोला, 'रोज-रोज
तो तुम दोनों लड़ती हो और कुप्पा होकर बैठी रहती हो। रसोई की ओर झांकती
तक नहीं हो। इसलिए दोपहर में मुझे सूखा भात खाकर पेट भरना पड़ता है। आज
न मुझे तुम्हारा फलाहार चाहिए, न दूध-दही और
न ही कुछ और चाहिए, मैं चला।'
गंगामणि बेटे के व्यवहार पर व्यथित हो उठी और अपनी कसम देकर बोली,
'मेरा राजा बेटा, मेरा
कहना मान ले, आज किसी की भीख का सेवन
बिल्कुल न करना। देख, जल्दी से नहाकर लौट
आएगा, तो तुझे चार पैसे भी दूंगी।'
गयाराम ने मुंह फेरकर ताई की ओर देखा तक नहीं। वह
चलते-चलते बोला, 'मुझे न तुम्हारे पैसे
चाहिए और न ही तुम्हारा बढ़िया खाना-पीना। तुम्हारे पैसों और फल-दूध पर
मैं...।' कहता हुआ वह चला गया। निराश,
खिन्न और व्यथित गंगामणि घर
लौट आई। वह गया के इस बुरे व्यवहार के लिए उसकी सौतेली मां को
उत्तरदायी मानकर उसे कोसती हुई उदास होकर बैठ गयी।
नदी की
ओर बढ़ते गयाराम के कानों में ताई की गुहार गूंजने लगी। एक तो वह वैसे
ही खाने का शौकीन था,
फिर आज पटाली गुड़ और सन्देस के साथ दूध-दही का
प्रलोभन भी था। इसके अलावा खिलाने के लिए खुशामद भी की जा रही थी। अत:
बहुत जल्द ही लड़के का क्रोध शान्त हो गया। फलत: वह जल्दी से नदी में
नहा-धोकर भूख से व्याकुलता अनुभव करता हुआ ताई के सामने आ खड़ा हुआ।
आंगन में पहुंचते ही वह चिल्लाकर बोला, 'ताई,
जल्दी से फल, दूध,
दही, आदि अब हाजिर कर।
आज यदि तुमने गुड़, सन्देस आदि के देने में
कुछ कंजूसी की, तो अपनी भूख मिटाने के लिए
मैं तुम्हें ही खा जाऊंगा।'
गया की
सेवा के लिए गौशाला में घुसती गंगामणि ने गयाराम की चिल्लाहट सुनी,
तो वह झूठा आश्वासन देने की अपनी गलती पर पछताने
लगी। घर में दूध, दही,
चिउड़ा और गुड़ तो था,
परन्तु केले, सन्देस और पटाली गुड़ आदि का तो
उसने वैसे ही नाम ले लिया था। उस समय तो गया को भीख का अन्न खाने से
रोकना था, वह प्रयोजन तो सिध्द हो गया,
किन्तु अब समस्या स्थिति को संभालने की थी। वह बोली,
'गया, तू कपड़े बदल,
इस बीच मैं नदी से पानी लेकर लौटती हूं।'
'जल्दी
आना',
कहकर गयाराम ने जल्दी से
कपड़े बदले,
अपने आप आसन बिछाया,
पानी का गिलास भरा
और पेट-पूजा के लिए तैयार होकर बैठ गया। गंगामणि पानी लेकर जल्दी से
लौट आई और गया को प्रसन्न देखकर सन्तुष्ट भाव से बोली,
'देख,
हंसता हुआ मेरा
बेटा कैसा प्यारा और सुन्दर लगता है?
अच्छे बच्चे
बात-बात पर बिगड़ा नहीं करते।'
इसके साथ ही वह
भण्डार-घर से खाने का सामान लाने चल दी। पल-भर में खाद्य सामग्री पर
दृष्टि उालने के बाद गयाराम उच्च स्वर में बोला,
'केले और सन्देस
कहां हैं?'
गंगामणि हकलाती हुई बाली,
'बेटा,
सच कहती हूं,
अन्तर्यामी साक्षी
हैं। ढकना भूल गई थी,
इसलिए चूहों ने सब गड़बड़
कर दी। मुझे तो लगता है कि अब घर में एक बिल्ली को पाले बिना काम नहीं
चलने वाला।'
गयाराम
हंसकर बोला,
''मेरे सामने चालाकी करती है। क्या चूहे कहीं केले
खाते हैं? मान क्यों नहीं लेती कि केले घर
में थे ही नहीं?' आश्चर्य प्रकट करती हुई
गंगामणि बोली, 'यह तू क्या कहता है,
क्या चूहे केले नहीं खाते?
मेरे पास नहीं थे, ऐसा
तू किस आधार पर कह सकता है?'
'अच्छा,
इस बहस को छोड़।
मैं मान लेता हूं कि चूहे केले खाते हैं। मुझे केले नहीं चाहिए। अब तुम
मुझे पटाली गुड़ और सन्देस तो दे। इन्हें देने में न देर लगा और न ही
कंजूसी कर।'
गयाराम दही-चिउड़ा मिलाकर
खाने लगा और इधर गंगामणि फिर से भण्डार की ओर चल दी। वह खाली मटकियों
और हांडियों को हिलाने का अभिनय करने के साथ बिलखती हुई बोली,
'मैं तो लुट गई,
सारे सन्देस भी
चूहे खा गए। अब तो गया मेरी बात पर विश्वास ही नहीं करेगा।'
संयम
खोकर चिल्लाता हुआ गया बोला,
'डाइन, मुझे बेवकूफ
बनाती है? क्या चूहे पटाली गुड़ भी खाते हैं?
जब तेरे पास यह सब था ही नहीं,
तो तुझे झूठ बोलने की क्या आवश्यकता थी?'
गंगामणि ने कहा, 'मैं सच
कहती हूं, सब कुछ था।'
गयाराम क्रोधावेश में उठकर खड़ा हो गया और बोला,
'ताई, यह नाटक मेरे साथ
नहीं चलेगा, मैं तेरी नस-नस पहचानता हूं। यह
ले, मुझे तेरे यहां कुछ नहीं खाना है?'
कहते हुए उसने पांव की ठोकर से सारा सामान बिखेर
दिया और एक लकड़ी की चोट से भण्डार में रखी मटकियों और हांडियों को भी
तोड़-फोड़ डाला। इसके बाद वह बोला, 'क्यों,
तुम्हारे झूठ बोलने का इतना दण्ड काफी है या नहीं?'
ताई द्वारा रोकने की चेष्टा
का परिणाम यह हुआ कि उसका हाथ भी जख्मी हो गया।
इस बीच
जमींदार के यहां से शिब्बू को लौटा देखकर गंगामणि रोने लगी,
तो गयाराम घात लगाकर घर से भाग लिया। शिब्बू ने
क्रुध्द स्वर में पूछा, 'क्या मामला है?'
रोती हुई गंगामणि बोली, 'घर
में घुसकर गया मेरे भंडार की मटकियां और हांडियां तोड़ गया है। मुझे भी
घायल कर गया है?' शिब्बू ने जमींदार के यहां
जाने से पहले अपने पढ़े-लिखे साले को उसके घर से अपने साथ ले लिया था।
इस समय वह भी यहां उपस्थित था। वह बोला, 'मुझे
तो यह सब आपके छोटे भाई की शैतानी लगती है। उसने लड़के को सिखा-पढ़ाकर यह
नुकसान कराया है। क्यों दीदी, क्या मैं गलत
कह रहा हूं?'
उस समय
उत्तेजित एवं दुखी गंगामणि अपने भाई की हां मे हां मिलाकर बोली,
'भैया तुम सच कहते हो,
यह इनके भाई और छोटी बहू की शिक्षा का फल है।'
यह कहकर उसने अपने घर पर सांकल लगाई और हाथ में
लकड़ी लेकर आंगन में आकर चिल्लाने लगी, 'क्यों
देवरजी, बेचारे लड़के को क्यों सिखाते फिरते
हो? लो, मैं खड़ी
हूं, मुझे जितना पीटना हो,
आकर पीट लो। चाहे तो दोनों बाप-बेटे मिलकर ही
प्रयास कर लो।'
फलाहार
करने से निवृत्त हुए शम्भू ने हाथ में जलती लकड़ी लिए आंगन में खड़ी भाभी
के रौद्र रूप को देखा,
तो हैरान होकर बोला, 'आखिर
हुआ क्या है? कुछ बताओगे,
तो पता चलेगा।' अपनी
पत्नी को उलझता देखकर जमींदार के यहां से निराश लौटे शिब्बू का अभी तक
नहाना-खाना कुछ भी नहीं हुआ था। घर में इस नए काण्ड को देखकर वह एकदम
असंयत और असन्तुलित हो उठा,
वह मोटी सी कसम खाकर थाने पर रिपोर्ट लिखाने चल दिया।
शिब्बू
का प्रशिक्षित और समझदार साले का गयाराम से पहले से मनमुटाव था। वह
बोला,
'किसी के घर में घुसकर तोड़-फोड़ करना कानूनन अपराध
है। इसके लिए छह महीने की जेल का प्रावधान है। जीजाजी,
आप चाहो, तो मैं
बाप-बेटे से चक्की चलवा सकता हूं।' शिब्बू
साले के हाथ को पकड़कर थाने को चल दिया। इधर गंगामणि ने फिर से देवर को
ललकार, तो वह बोला, 'भाभी,
भगवान की कसम, मुझे कुछ
मालूम नहीं कि किसने क्या किया है।' गंगामणि
चिढ़ाती हुई बोली, 'दारोगाजी के आते ही सब
मालूम हो जाएगा।' छोटी बहू खंभे के पास आकर
चुपचाप खड़ी हो गई और इधर शम्भू ने गयाराम को धौल लगाते हुए कहा,
'सुअर के बच्चे! क्या शैतानी कर आया है?'
फिर वह भाभी से बोला, ''भाभी,
मुझे अपनी कसम, विश्वास
करो, मुझे कुछ भी नहीं मालूम।'
ताई
जानती थी कि उसका देवर शम्भू इस घटना से एकदम अपरिचित है,
किन्तु यह समय क्षमा करने अथवा उदारता दिखाने का
नहीं था। अत: बाप पर बेटे के आने का दोष लगाती हुई गंगामणि ने खूब
बढ़ा-चढ़ाकर गयाराम की धूर्तता का वर्णन कर दिया। कम बोलने वाली छोटी बहू
ने कहा, 'कब से मैं आपसे इस लड़के के
उध्दत-उद्दण्ड होने की शिकायत कर रही हूं?
एक दिन यह मेरे बेटे को भी निगल जाएगा। पक्का पिशाच है यह। मेरी बात पर
तुम्हें विश्वास नहीं आता था, अब क्या अपनी
भाभी के कथन को भी अनसुना कर दोगे?' शम्भू
ने गिड़गिड़ाकर पूछा, 'भाभी,
कहीं भैया सचमुच ही तो थाने नहीं चले गए?'
देवर की दीनता से द्रवित होकर गंगामणि बोली,
'देवरजी, तुम्हारे भैया
पंचू को साथ लेकर थाने ही गए हैं।'
पति को
डर से कांपते देखकर छोटी बहू बोली,
'कितने दिनों से आपसे कह रही हूं कि नदी के उस पार
बन रहे सरकारी पुल पर गया को काम पर लगवा दो। वे चाबुक की चोट से काम
लेंगे। लाला को अकल आ जाएगी। मेरी न मानकर लड़के को स्कूल भेजने का क्या
लाभ होगा? इसे कौन-सा वकील या जज बनना है?'
शम्भू दुखी स्वर में बोला, 'क्या
तुझे इस लड़के से कोई मोह नहीं? मैंने सुना
है कि बहुत सारे मजदूर खुदाई में दबकर मर जाते हैं। इस हालत में,
मैं अपनी छाती पर पत्थर कैसे रख सकता हूं?'
छोटी बहू बोली, 'तो फिर
बाप-बेटा जेल की रोटियां तोड़ो।' भाभी की
खुशामद करता हुआ शम्भू बोला, 'अबकी बार
क्षमा कर दो और भैया को संभाल लो। मैं कल ही लड़के को पुल के काम में
लगाता हूं। न यह यहां रहेगा, न शैतानी कर
सकेगा।'
छोटी
बहू जेठानी से बोली,
'जब झगड़े की जड़ यह लड़का ही है,
तो जीजी, मेरी समझ में
नहीं आता कि तुम इसे अपने घर में घुसने ही क्यों देती है?
मेरा कहना तो सबको बुरा लगता है। किन्तु पिछले बार
भी तो इसने तुम्हारा मर्तबान तोड़ डाला था। अरे,
लातों के भूत कहीं बातों से मानते हैं?
मैं कहती हूं कि पुल के काम में लगा दो,
आदमी बन जाएगा।' शम्भू
ने कसम खाकर कहा, 'कल इस छोकरे को काम पर
लगाऊंगा, उसके बाद ही अन्न-जल ग्रहण करूंगा।'
गंगामणि ने हाथ की लकड़ी फेंक
दी और वह बिना कुछ बोले चली गई।
तीसरे
पहर गंगामणि अपने भूखे-प्यासे पति और भाई को भोजन खिलाने की तैयारी में
जुटी थी कि गयाराम आ धमका। घर में ताई को अकेला पाकर वह उसके पीछे आकर
खड़ा होकर उसे पुकारता हुआ बोला,
'ताई।' थका-मांदा गयराम
धम से बैठ गया और बोला, 'ताई पेट में चूहे
कूद रहे हैं, तेरे पास जो हैं,
दे दे, मैं वहीं खा
लूंगा। अब भूख नहीं सही जाती।' शांत हुई
गंगामणि फिर क्रुध्द हो उठी। वह उत्तेजित स्वर में बोली, 'ढीठ,
बेशर्म, बेहया,
फिर यहां चला आया मांगने... चल,
निकल यहां से, नहीं तो
जूतों से पिटाई करूंगी।'
गयाराम
बोला,
'क्या सचमुच चले जाने को कह रही है?'
गाली बकती हुई ताई बोली, 'हरामजादे,
नहीं तो क्या मैं तुम्हारे साथ मजाक कर रही हूं?'
'ताई, तेरे सिवा मुझे और
किसका सहारा है? तूने चूहे का नाम लेकर झूठ
बोला, इस पर मुझे क्रोध आ गया। सीधे-सीधे कह
देती, घर में यही कुछ है,
फिर देखती कि मैं खाता या नहीं,
डाइन, अब भूखा मत मार,
जल्दी से खाने को कुछ दे।'
थोड़ा शांत होकर गंगामणि बोली, 'भूख
लगी है, तो सौतेली मां के पास क्यों नहीं
जाता?' सौतेली मां के नाम को सुनते ही
उत्तेजित होकर गया बोला, 'उसका तो मैं कभी
मुंह भी नहीं देखूंगा। उस ससुरी से खाना मांगा,
तो बोली, जेल का भात
खाना। मैंने तेरे पास आने की कहीं, तो फिर
उस ससुरी ने मेरे पिता को उलटी-सीधी पट्टी पढ़ाई,
तभी तो उसने तुम्हारे हाथ से पत्ते छीने।'
इसके बाद रोते और धरती पर पैर पटकते हुए गया ने कहा,
'तुझे स्वयं पत्ते लाने के लिए जाने की क्या
आवश्यकता थी और इससे तुझे क्या मिला? अपना
सम्मान गंवाया और तकरार बढ़ाई। एक दिन मैं बांस के झुरमुट में आग लगा
दूंगा। मुझे कहा होता, तो क्या मैं न ला
देता? जानती हो कि मेरी सौतेली मां क्या
कहती है? वह कहती है-तेरी ताई ने तेरे
विरुध्द थाने में रपट लिखा दी है, अब दारोगा
तुझे बांधकर ले जाएगा और जेल में डाल देगा। ताई! क्या तू ऐसा क |