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अन्य वनवासियों के समान अभिव्यक्ति के लिये भीलों के
पास भी बोली तो है परन्तु लिपि नहीं। इसके बावजूद भी भील वनवासियों के
कल्पनाशील और मेधा सम्पत्र व्यक्तियों ने साहित्य सृजन की अद्भुत
प्रतिभा प्रदर्शित की है। भील वनवासियों का समस्त साहित्य सृजन मौखिक
ही हुआ है और हस्तांतरण भी मौखिक ही होता रहा है।
विचारों के अभिव्यक्ति में भाषा का
बहुत महत्व है। लिपि के माध्यम से विचारों और भावनाओं को बड़े क्षेत्र
में प्रसारित करने में सहायता मिली है। वहीं इन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी
संचारित करने और स्थायी धरोहर के रूप में संरक्षित रखने में भी सहायता
मिली है। आदिवासियों के पास बोली तो है परन्तु लिपि नहीं। इसलिए
परिवर्तनशील आदिवासी समाज के समक्ष अपने वाचिक साहित्य को संरक्षित
रखने की एक बहुत बड़ी समस्या है। इसलिए आदिवासियों के वाचिक साहित्य को
लिपिबध्द करना बहुत आवश्यक है।
अन्य
वनवासियों के समान अभिव्यक्ति के लिये भीलों के पास भी बोली तो है
परन्तु लिपि नहीं। इसके बावजूद भी भील वनवासियों के कल्पनाशील और मेधा
सम्पत्र व्यक्तियों ने साहित्य सृजन की अद्भुत प्रतिभा प्रदर्शित की
है। भील वनवासियों का समस्त साहित्य सृजन मौखिक ही हुआ है और हस्तांतरण
भी मौखिक ही होता रहा है। इस संदर्भ में महत्वपूर्ण यह है कि लिपि न
होने के बावजूद भीलों की साहित्यिक धरोहर सम्पन्न और सशक्त है। साहित्य
की समस्त विधाएं जैसे कथा,
गल्प, गीत,
पहेलियां, मुहावरे आदि
सब कुछ इनके पास हैं। इनकी लोककथाएं और लोकगीत जीवन के सभी पक्षों को
अभिव्यक्त करते हैं। हास-परिहास, जीवन-दर्शन,
स्वयं की उत्पत्ति,
दैनंदिन की समस्याएं, जन्म से मृत्यु तक के
संस्कार, बाह्य जगत
के साथ उनके अनुभव आदि सब विषयों पर इन्होंने साहित्य सृजन किया है।
एक
गल्पकथा में एक भील किसान और फसल व पक्षियों के सहसम्बन्ध का बहुत
सुन्दर चित्रण हुआ है। गल्प इस प्रकार है कि एक बार एक भील किसान ने
खूब परिश्रम किया। उसकी मेहनत रंग लाई और खेत लहलहाने लगी। जब फसल पकने
को हुई तो किसान की चिंता बढ़ गई। चिन्ता यह थी कि यदि रात में चोर आए
तो फसल की रक्षा कैसे हो?
इतने बड़े खेत की रखवाली वह कैसे करे?
इसी चिंता में वह घुलने लगा। वह
कमजोर हो चला। उसकी यह पीड़ा नन्हीं चिड़िया गोरैया से देखी न गई। उसने
सोचा कि खेत केवल किसान के लाभ के लिए ही तो नहीं है। उनका स्वयं का
हित भी तो खेत के साथ जुड़ा हुआ है। खेत से किसान का ही नहीं उसका और
अन्य पक्षियों का भी भरण पोषण होता है।
इसलिए
खेत की सुरक्षा करना किसान का ही नहीं उसका भीर् कत्तव्य है। इस विचार
से वह बहुत रोमांचित हुई। उसने खेत की रखवाली में किसान की सहायता करने
का निश्चय किया। नन्हीं चिड़िया ने उड़ान भरी और किसान की कुटिया की तरफ
चल पड़ी। किसान को देखते ही वह उसके कंधे पर बैठ गई। आत्मविश्वास के साथ
उसने किसान से कहा- किसान भाई दु:खी क्यों होते हो?
तुम्हारी चिंता मैं समझती हूं। तुम इसी बात से
चिंतित हो ना कि खेत खलिहान की रखवाली कैसे होगी?
तुम चिंता मत करो। खेत की रखवाली मैं करूंगी। यह सच
है कि खेत तुम्हारा है पर खेत के साथ हमारा जीवन भी तो जुड़ा है।
तुम्हारे खेत का दाना चुगने से ही तो मेरा और मेरे परिवार का भरण-पोषण
हो रहा है। क्या यह सच नहीं है कि यदि हम तुम्हारे खेत में दाना चुगते
हैं तो खेत की रखवाली करने का दायित्व हमारा भी तो है। इसलिए मेरी मानो,
खेत की रखवाली की तुम चिन्ता मत करो। खेत की रखवाली
मैं करूंगी। चिड़िया का प्रस्ताव सुन किसान चौंक गया। कौतूहल से उसने
पूछा-तुम तो स्वयं नन्हीं हो। तुम भला चोरों का सामना कैसे करोगी?
चिड़िया ने किसान की बुध्दि पर तरस खाते हुए कहा-अरे
भाई सभी काम ताकत से नहीं होते हैं। कुछ काम जुगत से भी तो होते हैं।
मैं जुगत का इस्तेमाल करूंगी। किसान का कौतूहल फिर भी शांत नहीं हुआ।
उसने पूछा-वह कैसे? चिड़िया ने कहा-सुनो! जब
खेत में चोर आएंगे तब मैं शोर मचाकर तुम्हें जगा दूंगी। बस,
फिर तो तुम चोरों को भगा ही दोगे। ठीक है न?
किसान को चिड़िया की बात पर हंसी आ गई। हंसते हुए
उसने कहा-नन्ही जान! तुम्हारी चीं-चीं में इतना दम कहां कि थके-मांदे
मुझ मानुष को जगा दे। किसान के व्यंग्य से चिड़िया आहत भी हुई और निराश
भी। अब वह क्या करे?
वह गहरे सोच में पड़ गई।
वह पेड़
की एक शाखा पर इसी सोच में बैठी हुई थी कि वहीं एक कौआ भी आकर बैठ गया।
चिड़िया को उदास देख उसने उससे उसकी उदासी का कारण पूछा। चिड़िया ने उसे
किसान की चिन्ता और उसकी सहायता करने में अपनी असमर्थता की समस्या
बताई। चिड़िया की बात सुन कौआ विचारमग्न हुआ। काफी सोच विचार के बाद
उसने चिड़िया से कहा-बहन तुम चिन्ता न करो। किसान की सहायता मैं करूंगा।
तुम तो जानती ही हो कि मेरी आवाज बहुत बुलन्द है। चोर आने पर जब मैं
कांव-कांव करूंगा तो किसान जरूर जाग जाएगा। इस तरह मैं उसके खेत की
रखवाली करूंगा। चिड़िया खुश हो गई। वह कौए को लेकर किसान के पास गई।
दोनों किसान के चबूतरे पर बैठ गए। कौए ने किसान के समक्ष उसकी सहायता
करने की पेशकश की। किसान असमंजस में पड़ गया। कौए को लगा कि शायद किसान
को चिड़िया के समान उसकी आवाज पर भी भरोसा नहीं है। उसने आत्मविश्वास के
साथ किसान को आश्वस्त करते हुए कहा-तुम चिन्ता मत करो। मेरी आवाज में
दम है। मेरी कांव-कांव इतनी जबरदस्त होती है कि तीन कोस तक सुनाई देती
है। किसान ने सिर पकड़ लिया। चिंतित होकर उसने कहा-ना बाबा ना। तुम्हारी
आवाज कर्कश है। मेरे बच्चे,
मेरी बकरियां, मेरी
मुर्गियां सब डर जाएंगे। तुम तो रहने ही दो। इसका उत्तर कौआ भला क्या
देता? किसान की बात
से कौआ और चिड़िया को गहरी निराशा हुई और वे उड़ कर फिर से पेड़ पर जा
बैठे।
किसान
को चिन्तामग्न देख उसका मुर्गा आकर उसके पास बैठ गया। किसान और उसके
बीच घर-गृहस्थी की और सुख-दु:ख की बातें हुई। बात-बात में किसान ने
मुर्गे को अपनी समस्या बताई और यह भी बताया कि चिड़िया और कौआ उसकी मदद
करना चाहते हैं पर उसने मना कर दिया। मुर्गे ने सहानुभूति जताते हुए
कहा-भाई मैं तुम्हारी चिंता समझता हूं। पर मेरे रहते तुम क्यों चिंता
करते हो?
मैं हूं ना तुम्हारे साथ। मेरी आवाज बुलंद है।
कर्कश भी नहीं है। तुम, तुम्हारे बच्चे,
तुम्हारी बकरियां और मुर्गियां सब तो जानते हैं
मुझे। मेरी आवाज से वे क्यों डरेंगे?
तुम चिंता मत करो। मैं खेत की
रखवाली करूंगा। जब चोर आएंगे तो मैं बांग देकर तुम्हें खबर कर दूंगा।
मुर्गे की बात किसान को जंच गई। वह आश्वस्त हुआ।
इस तरह
कुछ दिन सब ठीक चलता रहा। पर ऐसा कब तक चलता?
पकी फसल को देखकर चोरों का मन ललचाने लगा। एक रात
वे चोरी की नियत से किसान के खेत में घुस गए। मुर्गा तो चौकन्ना था ही।
वह बांग देकर किसान को जगाने की कोशिश करने लगा। दिन भर की मेहनत से
थका-मांदा किसान गहरी नींद में सोया था। किसान के खर्राटे में मुर्गे
की बांग दब गई। किसान उसे सुन नहीं पाया और उसकी गहरी नींद खुल नहीं
पाई। अब मुर्गा किसान की खाट के पास आकर चीखने-चिल्लाने लगा। पर किसान
कहां सुनने वाला था? इसके बावजूद मुर्गा
निराश नहीं हुआ। उसने अपनी कोशिश जारी रखी। मुर्गे की चीख-चिल्लाहट से
चोर चिन्तित हुए। मुर्गे को चिल्लाने से रोकने का चोरों ने बहुत
प्रयत्न किया। पर मुर्गा कहां मानने वाला था। चोरों ने सोचा चोरी तभी
संभव है जब मुर्गे को चुप करा दिया जाए। पर कैसे?
सीधी सी बात है। मुर्गे की बोलती बन्द कर दी जाए।
उन्होंने उसे पकड़ा और गर्दन मरोड़ दी। अब इस मुर्गे का क्या किया जाए?
देर किस बात की? पकाओ और
हजम करो। आनन-फानन में यह सब हो गया। फिर बेफिक्र होकर उन्होंने फसल
काटी, पोटलियों में बांधी और अंधेरे में
गायब हो गए। पर वे बहुत दूर न जा सके। मुर्गा हजम नहीं हो रहा था।
इसलिए पैर बड़ी मुश्किल से उठ रहे थे। थेड़ी दूर ही जा पाए थे कि भोर का
समय हो गया। भोर के समय मुर्गा बांग न दे,
ऐसा कैसे हो सकता है? चोरों के पेट में हो
या बाहर, इससे क्या फर्क पड़ता है?
उसे तो अपना काम करना ही था। सो वह चोरों के पेट
में ही जोर-जोर से बांग देने लगा- कुकडूक़ूं...। मुर्गे की बांग से चोर
चौंक गए। गांव पास ही था। चोरों के पेट से मुर्गे का चीखना बढ़ता ही जा
रहा था। चोर चिंता में पड़ गए कि यदि मुर्गे की बांग से गांव वाले जाग
गए तो वे मुसीबत में पड़ जाएंगे। क्या किया जाए?
उन्होंने तय किया कि मुर्गे से मुक्ति पाना जरूरी
है। पर कैसे? एक साथी
ने कहा-अपने पास हंसिया तो है ही। अपना पेट काट कर मुर्गे का निकाल
बाहर करो और उसकी गर्दन मरोड़ दो। बस फिर क्या था। आनन-फानन में ही
उन्होंने मुर्गे को पेट से बाहर किया। बाहर करते ही वह सरपट भागा। चोर
भी उसे पकड़ने के लिए लपके। पर मुर्गा उनके हाथ न आ रहा था। कभी वह सरपट
दौड़ता तो कभी उड़ कर किसी डाल पर बैठ जाता। देखते ही देखते वह चोरों की
पहुंच से दूर हो गया। चोर दौड़ते-दौड़ते हांफने लगे। चोरों ने यह जुगत तो
भिड़ाई थी कि अपना पेट काटकर मुर्गे को बाहर कर दो पर उसकी मोटी अकल में
यह बात नहीं आई कि पेट कट जाने पर वे भी मर जाएंगे। यही हुआ। चोर
मुर्गे को पकड़ पाते इसके पहले ही वे धराशायी हो गए।
मुर्गा बिना देर किए किसान के पास
पहुंचा। उसने सारी बात बताई। यह भी कहा कि चोर मर चुके हैं और किसान का
चोरी किया अनाज चोरों की पोटलियों में सुरक्षित है। किसान ने अपनी लाठी
उठाई और मुर्गे के पीछे चल पड़ा। चोरों को मरा हुआ देखकर उसकी खुशी का
ठिकाना न रहा। उस दिन से किसान और मुर्गे की दोस्ती हो गई तभी से भील
मुर्गी पालने लगे।
ऐसी ही
अनेक गल्प कथाएं भीलों द्वारा कही जाती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि
आप उसे कथा सुनाने के लिये प्रेरित करें और धैर्य से सुनते रहें।
बीच-बीच में हुंकारा देना न भूलें। लोक साहित्य में मुहावरों और
कहावतों का अपना महत्व और विशेष स्थान है। यदि उत्पत्ति की दृष्टि से
विचार करें तो यह स्पष्ट होता है कि मुहावरों और कहावतों के उद्गम आपसी
वार्तालाप के दौरान साहित्यिक अभिरुचि सम्पन्न किसी सृजनशील व्यक्ति के
द्वारा व्यक्त किए जाने वाले उद्गारों के बीच होता है। प्राय: यह
अनायास अद्भुत वैयक्तिक रूप में होता है परन्तु यह अर्थपूर्ण,
सरस, बोधगम्य और प्रभावी
होने से समुदाय में और फिर जन-जन में प्रचलित हो जाती है। मुहावरों और
कहावतों के माध्यम से व्यक्ति के सुख-दु:ख,
व्यथा, उल्लास,
आक्रोश, हताशा,
मनोदशा आदि की अभिव्यक्ति मिलती है।
यह व्यक्तियों के वार्तालाप या कथनों को वजनदार या प्रभावी भी बनाती
है। मुहावरों और कहावतों की रचना विचारपूर्वक नहीं की जाती है। यह
मनोभावों की सहज अभिव्यक्ति होती है। इनकी पहुंच व्यापक और सम्प्रेषण
हृदयग्राही होता है। इनमें लालित्य होता है। इसलिए यह जन-जन में
प्रचलित होकर लोगों की जबान पर चढ़ जाती है। सभी इनका उपयोग आपसी
वार्तालाप में यथास्थान करते हैं। व्यापक प्रचलन के कारण यह लोक में
बोलचाल की आम भाषा का अंग बन जाती है। बोलचाल में सामान्य रूप से इनके
प्रयोग के कारण इनका प्रचलन बड़े-बूढ़ों में ही नहीं युवाओं और बालकों
में भी हो जाता है। इस प्रकार मौखिक हस्तांतरण में इनका संचार पीढ़ी दर
पीढ़ी होता रहता है। नगरीय समाज में अवश्य ही इनका प्रयोग आम नहीं है।
मुहावरों और कहावतों का कोई शब्दकोष या
समग्र संकलन संभव नहीं है। समयानुकूल न होने पर भी कतिपय मुहावरे और
कहावतें प्रयोग से बाहर हो जाती हैं। कुछ नई जुड़ भी जाती हैं। इसके साथ
ही यह भी सत्य है कि स्थान के साथ मुहावरों और कहावतों में भिन्नता पाई
जाती है तो कुछ सार्वभौमिक होती हैं।
मुहावरों का संदर्भ से परे या स्वतंत्र प्रयोग करने पर वे अर्थहीन होती
हैं। बिना संदर्भ के उनके प्रयोग का कोई औचित्य नहीं होता है। संदर्भ
से हटकर मुहावरे का प्रयोग अनर्गल एवं अर्थहीन होता है। उदाहरण स्वरूप,
किसी बातूनी व्यक्ति के साथ निरंतर वार्तालाप करते
हुए थकने पर भील क्रोधित होकर कहते हैं- जेर सडावणु (माथा सड़ाना,
सिर दुखाना या क्रोधित करना)। इस प्रसंग या संदर्भ
के बिना जेर सडावणु का प्रयोग अर्थहीन है। इसी प्रकार नाम काडवूं
(बदनाम करना), कानामां बात केवी (गोपनीय
चर्चा करना), रोटलो टुटवी (बोरोजगार होना),
तलवारे नी धार (दुष्कर कार्य),
माथुं डालोववुं (स्वीकार न करना),
डाडी करवी (दुख प्रगट करना) आदि मुहावरों को
विशिष्ट संदर्भ में ही जाना और समझा जा सकता है। इसके विपरीत कहावतें
अपने आप में परिपूर्ण और अर्थमय होती हैं। बिना संदर्भ के भी उनके अर्थ
को सहज ही ग्रहण किया जा सकता है। उदाहरण
स्वरूप,
हुकुम बगर पान नी डाले (ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ
नहीं हो सकता है), बामण वालो ववराटो है
(दूसरों को उपदेश देने में ब्राह्मण प्रवीण होता है),
आज कारवानु काल ने माथे ना राखवूं
(आज का काम कल पर नहीं टालना चाहिए) आदि कहावतें अपने आप में स्पष्ट और
अर्थपूर्ण हैं।
कहावतों के माध्यम से उत्साह,
उमंग, सुख-दुख,
पीड़ा और परेशानियों की अभिव्यक्ति होती है। साथ ही
उनका स्वर सचेतात्मक, उपदेशात्मक और
दार्शनिक भी होता है। उदाहरण देखिए- भूखला तो भूखला खरी (भूखा ही सही
पर सुखी तो हूं), भोला नो भगवाना से (सीधे
सादे व्यक्तियों का रक्षक भगवान होता है),
पापनो घड़ो फूटया वगर ने रे (पाप का घड़ा फूटे बिना नहीं रहता),
सत् सांदेणियें देखा (सत्य तो चांदनी में भी दिखाई
देता है), कालो होप आडो आयो (काला सांप बाधक
बना-बड़े दुश्मन से पाला पड़ा है),
जुग-जेरी है तो मलख बेरी है (बुरे बोल बैर उपजाते हैं)
आदि। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि जीवन से जुड़े यथार्थ को कहावतों के
माध्यम से वनवासी बहुत ही सहज और प्रभावी रूप से अभिव्क्त करते हैं।
आदिवासी बालक-बालिकाएं धीरे-धीरे अपनी
बोली से दूर होते जा रहे हैं। इसी प्रकार रोजगार की तलाश में अपने
ग्राम और समुदाय को त्याग कर नगरों में बस गए आदिवासी भी धीरे-धीरे
अपनी बोली और लोक संस्कृति से नाता तोड़ रहे हैं। बहुत संभव है कि आने
वाले समय में आदिवासी संस्कृति और साहित्य केवल वाचिक सम्प्रेषण के
माध्यम से जीवित न रह पाए। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम
आदिवासियों में उपलब्ध शिक्षितजनों और आदिवासियों की संस्कृति और
सामाजिक व्यवस्था की चिंता करने वाले मनीषियों की सहायता से लिपिबध्द
कर लें। |