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जून,  2008

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व्यवस्था परिवर्तन के लिए सुगबुगाहट

प्रवीण तलवार

भारतीय समाज ने आजादी के 35 साल बाद तक सरकारवाद को झेला और बाद के 25 साल में उसे बाजारवाद की मार झेलनी पड़ी। आज हालत यह है कि चंद औद्योगिक घराने राजनीति को चला रही हैं। राजनीतिक दलों में कोई फर्क नहीं रह गया है। सारे दल नोट और वोट के खेल में शामिल हैं। सत्ता जनता का शोषण करने में लगी है।

इस व्यवस्था के प्रति निराशा और असंतोष आम लोगों के बीच फैलता ही जा रहा है। अब समाज इस दिशा में सिर्फ सोच ही नहीं रहा है बल्कि कुछ ना कुछ करने की पहल भी हो रही है। इस व्यवस्था के प्रति आमजन का असंतोष तो नया नहीं है लेकिन इसके खिलाफ आवाज बुलंद करने के नए-नए राह अख्तियार किए जा रहे हैं। इसके लिए कई संगठन अपने-अपने स्थान पर कोई ना कोई गतिविधि चला रहे हैं।

बीते दिनों राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जहांगीरपुरी में राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन ने  'व्यवस्था परिवर्तन यात्र' का आयोजन किया। इसमें बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। इससे इस बात का आभास होता है कि अब लोग वैकल्पिक व्यवस्था स्थापित करने की  मुहिम के साथ जुड़कर इस लक्ष्य को पाना चाहते हैं।

इस यात्र का नेतृत्व राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक के.एन. गोविंदाचार्य ने किया। यात्र के बाद उन्होंने मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि यह भारतीय व्यवस्था देशवासियों की समस्याओं को हल करने में असफल रही है। आजादी के छह दशक गुजरने और देश के साधन संपन्न होने के बावजूद भी भारत के 72 प्रतिशत लोग बीस रुपए रोज से भी कम पर जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। गोविंदाचार्य ने कहा, 'राज्य व्यवस्था के अंग विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया बाजारवाद की शिकार हो गई है। यह व्यवस्था  जनता की जरूरतों से कट चुकी है। कुछ लोग सारी व्यवस्था का उपयोग अपनी आर्थिक और सामाजिक हैसियत और अपने सामाजिक दबदबे को बढ़ाने के लिए कर रहे हैं।'

अब ऐसे में अहम सवाल यह है कि आखिर इस विकट समस्या का समाधान कैसे हो? अगर हम किसी भी समस्या से निजात पाना चाहते हैं तो पहले उसे अच्छी तरह समझना होता है और फिर उसी के मुताबिक उससे पार पाने के तरीके अपनाए जाते हैं। इस समस्या के बारे में लोगों को बताते हुए गोविंदाचार्य ने कहा, 'भारतीय समाज ने आजादी के 35 साल बाद तक सरकारवाद को झेला और बाद के 25 साल में उसे बाजारवाद की मार झेलनी पड़ी। आज हालत यह है कि चंद औद्योगिक घराने राजनीति को चला रही हैं। राजनीतिक दलों में कोई फर्क नहीं रह गया है। सारे दल नोट और वोट के खेल में शामिल हैं। सत्ता जनता का शोषण करने में लगी है।'

उन्होंने आगे कहा कि गरीबों को हक दिलाने के लिए व्यवस्था परिवर्तन जरूरी है। इसके लिए चुनाव की प्रक्रिया बदले। साथ ही अंग्रेजों के जमाने के काले कानून भी बदले जाएं। संविधान सभा में किसान, मजदूर और कारीगरों का प्रतिनिधित्व कम था इसलिए उन्हें उपेक्षा  की मार झेलनी पड़ी। आज नए संविधान सभा के गठन की आवश्यकता है। जिसमें इन तबकों का भी प्रतिनिधित्व हो। नए संविधान सभा के गठन के लिए बडे ज़नआंदोलन की जरूरत है। मौजूद लोगों को राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के सहसंयोजक रमेश डागर, बहन अनुभूति और राजकुमार भाटिया ने भी संबोधित किया।

 

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन