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मई,  2008

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'हे राम' गांधीजी पर रहम करो    

दिलीप मिश्रा

अब गांधी जी ने 'हे राम' कहा था या नहीं इस विवाद को जन्म देने वाले बताएं कि गांधी जी के सपनों का भारत साठ साल में भी क्यों नहीं बन पाया? जिस प्रकार अब हम अपने स्वार्थ के कारण महात्मा गांधी के कहे शब्दों को विवादित मानने लगे हैं उसी प्रकार हमारे सत्ताधीश अपने स्वार्थों के कारण श्रीराम को ही नहीं बल्कि उनके श्रध्दा के स्थान को भी अस्वीकार करने लगे हैं।

 

महात्मा गांधी को हमारे देश में कुछ लोगों ने विवाद का विषय बना दिया है। इसका कारण उनका विचार, उनका दर्शन और उनका अनुकरणीय जीवन चरित्र न हो कर उनके नाम का उपयोग है। वैसे आज कल एक नया विवाद 'हे राम' को लेकर भी है। महात्मा गांधी ने मरते समय 'हे राम' कहा था या नहीं, यह चर्चा का विषय है। बापू के एक निजी सचिव का कहना है कि उन्होंने मरते समय 'हे राम' नहीं कहा था। जबकि इससे पहले ही बापू के प्रपौत्र तुषार गांधी यह कह चुके हैं कि बापू ने मरते समय 'हे राम' ही कहा था। बापू की समाध राजघाट पर भी 'हे राम' ही अंकित है। प्रश्न यह नहीं है कि बापू ने हे राम कहा था या नहीं? प्रश्न यह है कि इस देश में और इस देश की जनता में बापू और राम दोनों ही रचे बसे हैं परन्तु कुछ स्वार्थी तत्वों ने बापू और श्री राम दोनों को ही विवादास्पद बना दिया है? जबकि देश की जनता तो आज भी राम और गांधी को महान और आदर्श मानती है। पर गांधी और श्रीराम के प्रति यह कृतधनता जनता के प्रतिनिधियों और देश के तथाकथित महान लोगों ने की है। वस्तुत: गांधीजी के विचारों पर विवाद नहीं, चिंतन होना चाहिए कि बापू राम को किस रूप में अपने जीवन में स्वीकारते थे? सवाल यह भी है कि आज गांधीजी के अनुयायी और उनके नाम पर कार्य करने वाले तमाम संगठन तथा दल बापू के राम को कितना स्वीकार करते हैं? आज बापू का रामराज्य देश में कहां है? बापू के आदर्शों पर चलने वाले क्यों बापू के राम के ही जन्म को विवादास्पद बना देने पर तुले हुए हैं? बापू के ट्टण से यह देश उट्टण नहीं हो सकता लेकिन हम हैं कि बापू को विवादास्पद बना कर हम उनकी बार-बार हत्या ही कर रहे है?

गांधीजी पर विवादों की तपन में सस्ती लोकप्रियता के हाथ सेंकने वाले लोगों को यह अच्छी तरह पता होना चाहिए कि गांधीजी और श्रीराम किसी विचारधरा और किसी संप्रदाय की तुच्छ दीवारों के बंध्क महापुरुष नहीं हैं। उन पर एकाध्किार का दावा करने वाले केवल उनके नाम का उपयोग कर सकते हैं, परन्तु उनके आदर्शों पर चलने और उनका पालन करने का दावा नहीं कर सकते हैं। यह जान लेना आवश्यक है कि राम केवल र्ध्म प्रधन देवता नहीं हैं और न ही गांधी दलप्रधन महापुरुष।

जिस प्रकार भगवान श्री राम आदर्श जीवन चरित्र के प्रतिपादक और भारत की सांस्कृतिक पहचान हैं उसी प्रकार महात्मा गांधी सार्वजनिक जीवन में शुचिता, सैध्दान्तिक शुध्दता और दैनिक जीवनचर्या में सहिष्णुता पूर्ण विचार और कार्य संस्कृति के प्रतीक थे। अब यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए कि आज के प्रगतिशील और विकासशील 'इंडिया' में ये दोनों ही नाम अप्रासंगिक बनाए जा रहे हैं। गांधीजी का 'रामराज्य' लोककल्याणकारी और गोस्वामीजी द्वारा रामराज्य की परिभाषा के अनुरूप ही था। श्रीराम की राज्य व्यवस्था, गांधीजी के अनुसार विश्व की श्रेष्ठ राज्य व्यवस्था थी। अब गांधीजी ने 'हे राम' कहा था या नहीं इस विवाद को जन्म देने वाले बताएं कि गांधी जी के सपनों का भारत साठ साल में भी क्यों नहीं बन पाया? जिस प्रकार अब हम अपने स्वार्थ के कारण महात्मा गांधी के कहे शब्दों को विवादित मानने लगे हैं उसी प्रकार हमारे सत्ताधीश अपने स्वार्थों के कारण श्रीराम को ही नहीं बल्कि उनके श्रध्दा के स्थान को भी अस्वीकार करने लगे हैं। ऐसे में कुछ दशकों के बाद ऐसा भी हो सकता है कि हम महात्मा गांधी के जन्म को भी अस्वीकार कर दें और यह कहने लगें कि गांधी नामक कोई महापुरुष गुजरात के पोरबन्दर नामक स्थान पर जन्मा ही नहीं था। वह तो किसी लेखक या इतिहासविद् की कल्पना की उपज मात्र है।

कहना न होगा कि जब किसी देश के सत्ताधश और प्रबुध्दजन अपने ही देश के महापुरुषों, आस्था के स्थानों और उनके सिध्दांतों को अस्वीकार करने लगें और इनको प्रगति और उन्नति में बाध्क मानने लगें तो वह देश विकाश के मार्ग पर नहीं विनाश के मार्ग की तरफ अग्रसर होने लगता है। रोम, ईरान, यूनान सहित कई देशों की संस्कृति इसी कारण मिट गई। ऐसे में हमें चेत जाना चाहिए और इस विषम स्थिति को चुनौती के रूप में स्वीकार कर इसका सामना करना चाहिए।

संपर्क: दानाओली, ग्वालियर, मध्यप्रदेश

 

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन